मिशन यूपी: प्रियंका फुल फॉर्म में सामने है 5 सबसे बड़ी चुनौतियां, क्या मोदी पर पड़ेंगी भारी?

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लखनऊ, । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा लखनऊ पहुंची चुकी हैं। अमौसी एयरपोर्ट पर उतरने के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा और ज्योतिरादित्य सिंधिया का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। एयरपोर्ट पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर ने राहुल गांधी और प्रियंका का स्वागत किया। प्रियंका गांधी ने रोड शो शुरू कर दिया है। रोड शो शहीद पथ तिराहे से अवध चौराहा, आलमबाग, नत्था होटल तिराहा, हुसैनगंज चौराहा, बर्लिंगटन चौराहा, लाल बाग तिराहा, हजरत गंज चौराहा से राज भवन होते हुए कांग्रेस कार्यालय पहुंचेगा। रोड शो को देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। एयरपोर्ट से लेकर कांग्रेस प्रदेश कार्यालय तक करीब 42 स्थानों पर प्रियंका वाड्रा का स्वागत किया जायेगा।

हजरतगंज चौराहे पर स्थित अम्बेडकर प्रतिमा पर प्रियंका वाड्रा माल्यार्पण भी करेंगी। कांग्रेस महासचिव व पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिलने के बाद प्रियंका वाड्रा पहली बार लखनऊ आयी हैं। प्रियंका को पदभार ग्रहण कराने खुद कांग्रेस अध्यक्ष व उनके भाई राहुल गांधी भी आये हैं। इसके अलावा कांग्रेस महासचिव व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया भी हैं। प्रियंका विशेष बस से रोड शो कर रही हैं। रथ पर प्रियंका वाड्रा, राहुल गांधी,ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजबब्बर सवार हैं। रथ के पीछे कार्यकर्ताओं का हुजूम चल रहा है। रास्ते में प्रियंका की एक झलक पाने को लोग सड़कों पर जमे हुए हैंं।

लखनऊ की सड़कें राहुल प्रियंका की होर्डिंग से पटे हुए हैं। यहां से गुजरेगा प्रियंका का रोड शो – एयरपोर्ट से पुराने मोड़ के माध्यम से कानपुर रोड – अवध हॉस्पिटल चौराहा – आलमबाग चौराहा – नत्था होटल तिराहा – हुसैनगंज – बर्लिंगटन चौराहे से बायें – ओडिएन सिनेमा के सामने से – लालबाग गर्ल्स कॉलेज की बाउंड्रीवॉल से दाहिने – लालबाग चर्च के सामने से नावेल्टी सिनेमा हॉल होते हुए – हजरतगंज (मेफेयर तिराहे से दाहिने) – नार्दर्न रेलवे के डीआरएम आफिस के सामने से – हजरतगंज के बड़े चौराहे पर महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल और डा. भीमराव अम्बेडकर की मूर्तियों पर माल्यार्पण – डीएसओ चौराहा के सामने से – राजभवन के सामने से – वीवीआईपी गेस्ट हाउस के सामने से होते हुए दाहिनी तरफ मुड़ कर लाल बहादुर शास्त्री – सुन्नी वक्फ बोर्ड से बायें मुड़कर प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय

यह है 5 सबसे बड़ी चुनौतियां

कमजोर संगठन
कांग्रेस पार्टी के सामने उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती संगठन की कमजोर हालत है। 1989 में सूबे की सत्ता हाथ से जाने के बाद क्षेत्रीय पार्टियों के उभार के दौर में कांग्रेस का संगठन कमजोर होता चला गया। चुनाव दर चुनाव कार्यकर्ता पार्टी से दूर होते चले गए। ज्यादातार जिलों में कार्यकारिणी (जिला कांग्रेस कमिटी) कागजी तौर पर काम कर रही है और जमीन पर हालात एकदम उलट हैं। उत्तर प्रदेश में किसी बड़े विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस की नुमाइंदगी की तस्वीर लोगों के दिलोदिमाग में धुंधली पड़ चुकी है।

बड़े नेताओं की कमी
उत्तर प्रदेश में पार्टी को बड़े नेताओं की कमी से जूझना पड़ रहा है। बदलते दौर में कांग्रेस के कद्दावर नेताओं ने क्षेत्रीय पार्टियों (एसपी-बीएसपी) या फिर बीजेपी में अपनी जगह बना ली। सूबे की सियासत में लंबे अरसे से सक्रिय जगदंबिका पाल और रीता बहुगुणा जोशी जैसे नेताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया। हालात का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में पिछले साल तीन नेताओं एमएलए राकेश प्रताप सिंह, एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह और जिला पंचायत अध्यक्ष ने पार्टी को अलविदा कह दिया। पूर्व गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह को छोड़कर पूर्वांचल में कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है। वहीं, अखिलेश प्रताप सिंह सिर्फ टीवी डिबेट्स में नजर आते हैं। ऐसे में प्रियंका को यहां माहौल बनाने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।

पूर्वांचल का किला 
प्रियंका गांधी को जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है, वह अभी बीजेपी का सबसे मजबूत किला माना जाता है। इलाके के दो सबसे बड़े शहरों वाराणसी और गोरखपुर में प्रियंका के लिए राह कठिन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद हैं, जबकि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से आते हैं। यहां की 43 लोकसभा सीटों (पूर्वांचल और अवध क्षेत्र की मिलाकर) को मथने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है। अब तक अमेठी और रायबरेली तक सीमित रहीं प्रियंका को इस बड़े क्षेत्र के जमीनी हालात और समस्याओं को समझना बड़ी चुनौती होगा।

वोट बैंक
यूपी में हर चुनाव के साथ कांग्रेस का वोट बैंक खिसकता चला गया। कभी दलितों और मुसलमानों के बीच मजबूत पैठ रखने वाली कांग्रेस का वोट बैंक सिकुड़ चुका है। जहां एक ओर दलित कांग्रेस छोड़ बीएसपी की नाव पर सवार हो चुके हैं, वहीं मुसलमानों का झुकाव एसपी की ओर ज्यादा है। लोकसभा चुनाव से पहले ही एसपी-बीएसपी ने गठबंधन का ऐलान कर दिया है। वहीं, सवर्णों में पार्टी पहले ही अपना आधार खो चुकी है। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण का कानून पास करवाते हुए कांग्रेस को चौंका दिया। जातियों में बंटी यूपी की जटिल सियासत को साध पाना प्रियंका के लिए आसान नहीं होगा।

जिताऊ चेहरे
कांग्रेस को मजबूत, टिकाऊ और जिताऊ कैंडिडेट की कमी से भी दोचार होना पड़ रहा है। प्रियंका को लोकसभा चुनाव में सही चेहरे का सिलेक्शन करने की माथापच्ची से जूझना होगा। उन्हें दल-बदलू नेता और पुराने कार्यकर्ता के बीच किसी एक को चुनना पड़ेगा। चुनाव में ऐंटी बीजेपी वोट उसी कैंडिडेट की ओर घूमता है, जिसके जीतने की संभावना सबसे ज्यादा हो। उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान जब एसपी-कांग्रेस गठबंधन की हार हुई तो एसपी के कई बड़े नेताओं ने हार का ठीकरा कांग्रेस के कमजोर कैंडिडेट पर फोड़ा था। गठबंधन के तहत कांग्रेस 105 सीटों पर लड़ी थी लेकिन जीत सिर्फ 7 पर नसीब हुई।

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