क्या मायावती के लोकसभा चुनाव न लड़ने के पीछे ये है वजह ?

लखनऊ । बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती ने कहा है कि वह 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी। लखनऊ में बुधवार को मीडिया से उन्होंने कहा कि वह अपना पूरा ध्यान बसपा के प्रत्याशियों को जिताने पर लगायेंगी और देशभर में प्रचार करने जायेंगी। चुनाव बाद अगर वह समझेंगी कि केन्द्र में उन्हें जाना है तो वह अपने किसी प्रत्याशी से इस्तीफा लेकर उपचुनाव कराने के बाद संसद जायेंगी।
मायावती ने कहा कि मेरी जीत की जिम्मेदारी कार्यकर्ताओं की है।

विरोधियों के खिलाफ बसपा मजबूती से चुनाव लड़ेगी। मायावती ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारी समस्त देशवासियों से अपील है कि वह सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय की सरकार चुनें।

बसपा प्रमुख समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ उत्तर प्रदेश के देवबंद में 7 अप्रैल को संयुक्त रैली में शामिल हो सकती हैं। मायावती यादव परिवार के गढ़ मैनपुरी में चुनाव जनसभा करेंगी। मायावती और मुलायम सिंह एक साथ एक ही मंच पर नजर आने वाले हैं जहां बसपा सुप्रीमो सपा के लिए वोटों की अपील करती नजर आएंगी। मुलायम सिंह यादव इस बार भी मैनपुरी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे।

जानिए क्या है चुनाव न लड़ने की वजह

मायावती का खुद लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने के ऐलान ने बहुत लोगों को आश्चर्य में डाल दिया होगा। लेकिन, यह अचानक लिया गया फैसला नहीं है। बीएसपी सुप्रीमो ने यह फैसला सारे नफा-नुकसान का आकलन करने के बाद ही सोच-समझकर लिया है। क्योंकि, यह चुनाव बहन जी के करियर सबसे बड़ा चुनाव होने जा रहा है।

सबसे बड़ा इस नजरिए से कि इसमें मिली कामयाबी उन्हें उस कुर्सी तक पहुंचा सकता है, जहां अबतक देश का एक भी दलित नेता नहीं पहुंचा है। लेकिन, अगर इसबार वह अपना दबदबा दिखाने में नाकाम रह गईं, तो फिर उनके पूरे राजनीतिक भविष्य पर ही प्रश्नचिन्ह लग सकता है। इसलिए, उनकी पहली कोशिश है, यूपी में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की, जिसके दम पर वह अपनी आगे की दावेदारी मजबूत कर सकें ..

बता दें कि यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर एसपी-बीएसपी और आरएलडी गठबंधन के तहत चुनाव लड़ रहे हैं। बीएसपी 38, एसपी 37 और आरएलडी 3 सीटों पर मैदान में उतरेगी। वहीं, दो सीटों अमेठी और रायबरेली को बिना गठबंधन किए कांग्रेस के लिए छोड़ा गया है। इससे पहले सोमवार को बीएसपी चीफ ने कांग्रेस की ‘दरियादिली’ को कोई भाव नहीं देते हुए कहा था कि कांग्रेस 7 सीटें छोड़ने का भ्रम न फैलाए और वह राज्य की सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने को स्वतंत्र है।

माया ने ट्वीट में कहा, ‘बीएसपी एक बार फिर साफ तौर पर स्पष्ट कर देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में कांग्रेस पार्टी से हमारा कोई भी किसी भी प्रकार का तालमेल और गठबंधन आदि बिल्कुल भी नहीं है। हमारे लोग कांग्रेस पार्टी द्वारा आए दिन फैलाए जा रहे किस्म-किस्म के भ्रम में कतई ना आएं।’ इस ट्वीट को रीट्वीट करते हुए एसपी चीफ अखिलेश यादव ने भी उनका समर्थन किया था।

माया को है अखिलेश पर पूरा भरोसा 

बुआ को अपने 20% से ज्यादा वोट बैंक पर तो भरोसा है ही,अब उतना ही भरोसा अपने बबुआ यानि अखिलेश यादव और उनके वोट बैंक पर भी है। पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को भी यूपी में 22% से ज्यादा मत मिले थे। अपने गठबंधन के बारे में वह पहले ही कह चुकी हैं कि वे आपसी सम्मान और पूरी नेक नीयत के साथ काम कर रहे हैं, जिसमें बीजेपी को हराने की पूरी क्षमता है। सबसे बड़ी बात ये है कि अखिलेश यादव भी कह चुके हैं कि वह चाहते हैं कि अगला प्रधानमंत्री भी उत्तर प्रदेश से ही बने, जाहिर है उन्होंने अगर ऐसी उदारता दिखाई है, तो उनके दिमाग में नरेंद्र मोदी तो होंगे नहीं।

इसलिए, बुआ को पक्का यकीन है कि उनके बारे में बबुआ की राय पार्टी के पहले के नेताओं से अलग है। वह जानती हैं कि अगर गठबंधन के पास सांसदों का नंबर होगा, तो प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी को अखिलेश जरूर आगे बढ़ाएंगे।

.इसलिए अभी सारे पत्ते नहीं खोलना चाहतीं बुआ मायावती जानती हैं कि एकबार उनके पक्ष में आंकड़े आ गए, तो किसी भी रास्ते से संसद में पहुंचना उनके लिए बाएं हाथ का खेल होगा। शायद इसलिए उन्होंने कहा भी है कि मैं जहां से चाहूं सीट खाली कराकर संसद में जा सकती हूं। वो पहलीबार 1994 में राज्यसभा के लिए चुनी गई थीं और हाल तक इस्तीफा देने से पहले वह राज्यसभा सांसद थीं। वो कई बार जीतकर लोकसभा में भी पहुंच चुकी हैं। लेकिन, अगर वो अभी खुद लोकसभा चुनाव लड़ेंगी, तो समाजवादी पार्टी के कैडर में विरोधी उनके प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजर होने की बात उड़ाकर गठबंधन को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। यही नहीं, खुद चुनाव लड़ने पर उनके पार्टी के बाकी नेताओं और कार्यकर्ताओं का भी ध्यान उस सीट पर सिमट सकता है,

जिसपर बहन जी उम्मीदवार होंगी और इसका खामियाजा बाकी सीटों पर भी भुगतना पड़ सकता है। जबकि, मायावती जानती हैं कि अगर उनके पास सांसदों के अधिक से अधिक नंबर होगा तो चुनाव के बाद दलित कार्ड खेलना उनके लिए बहुत ही आसान हो जाएगा। मौजूदा परिस्थितियों में अखिलेश कभी उनकी दावेदारी नहीं ठुकराएंगे और दलित होने के नाम पर कांग्रेस समेत सभी गैर-विपक्षी पार्टियां उन्हें समर्थन देने को मजबूर हो जाएंगी।

त्रिशंकु लोकसभा बनने की स्थिति में मायावती के पक्ष में उनका दलित होना और साथ-साथ महिला होना भी काफी अहम साबित हो सकता है। लेकिन, ये सारे कयास और समीकरण चुनाव बाद की परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। इसलिए, बीएसपी सुप्रीमो अभी से अपने सारे पत्ते नहीं खोल रही हैं, लेकिन उनका सबसे बड़ा लक्ष्य देश का पहला दलित प्रधानमंत्री बनना है।

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