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Friday,19 January 2018
    बाहुबल और ब्रह्मबल

    बाहुबल और ब्रह्मबल

    द्वापर के आरम्भ में ब्रह्मावर्त देश में दंभोद्भव नामक एक प्रतापी राजा हुआ। वह बड़ा ही बलवान और तेजस्वी था। शारीरिक बल में वह ऐसा अद्वितीय था कि दूर-दूर उसके समान योद्धा दिखाई न पड़ता, जिसे लड़ने के लिये ललकारता वही भयभीत हो जाता और गिड़गिड़ा कर क्षमा माँग लेता।

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    ब्रह्माण्ड के कण कण में है अनाहत-नाद

    ब्रह्माण्ड के कण कण में है अनाहत-नाद

    ध्वनि शक्ति के रूप में शब्द शक्ति को तेसर से भी अधिक सामर्थ्यवान एवं शक्तिपुंज माना गया है । इसी आधार पर विज्ञान ने खगोल जगत में ब्रह्मांडीय आदान-प्रदान की संभावना अभिव्यक्त की है, जबकि सूक्ष्म जगत में चलने वाले घटना क्रमों की पूर्व जानकारी को अध्यात्म ने संभव बनाया है ।

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    प्रार्थना का आत्मिक रहस्य

    प्रार्थना का आत्मिक रहस्य

    ईश्वर पूजा के स्थूल उपकरणों का सूक्ष्म आध्यात्मिक महत्व है। उस सूक्ष्म तथ्य को समझे बिना जो लोग केवल मात्र भौतिक कर्मकाण्डों के बाह्य आडंबरों तक ही अपनी दृष्टि सीमित रखते हैं, वे पूजा के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाते और न उसके सच्चे लाभ को ही प्राप्त कर पाते हैं।

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    जड़ नहीं प्रगतिशील बनें

    जड़ नहीं प्रगतिशील बनें

    परिवर्तन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। संसार की हर वस्तु समयानुसार बदलती है। शैशव, यौवन, बुढ़ापा और मृत्यु की शृंखला ही इस संसार को गतिशील, स्वच्छ और सुन्दर बनाये हुए है। जड़ता तो केवल कुरूपता उत्पन्न करती है।

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    स्वयं का सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा

    स्वयं का सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा

    मन एक देवता है। इसे ही शास्त्रों में प्रजापति कहा गया है। वेदान्त में बताया गया है कि हर व्यक्ति की एक स्वतंत्र दुनिया है और वह उसके मन के द्वारा सृजन की हुई है। मनुष्य की मान्यता, भावना, निष्ठा और रुचि एवं आकांक्षा के अनुरूप ही उसे सारा विश्व दिखाई पड़ता है। यह दृष्टिकोण बदल जाय तो मनुष्य का जीवन भी उसी आधार पर परिवर्तित हो जाता है। इस मन देवता की सेवा पूजा का एक ही प्रकार है, मन को समझा बुझाकर उसे सन्मार्ग पर लगाना। सही दृष्टिकोण अपनाने के लिए सहमत करना। यदि यह सेवा कर ली जाय तो सामान्य व्यक्ति भी महापुरुष बन सकता है। उसके वरदान का चमत्कार प्रत्यक्ष देख सकता है।

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    निष्काम भक्ति के दोहरे लाभ

    निष्काम भक्ति के दोहरे लाभ

    इस विश्व में सबसे बड़ा रस प्रेम का है। इस की एक−एक बूँद के लिए आत्मा तरसती रहती है और जहाँ कहीं उसे इस मधुर मधु की एक बूँद भी उपलब्ध हो जाती है वहीं वह उसकी बड़ी से बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हो जाती है। बालक में प्रेम भाव की मान्यता करके माता उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करती है और कुरूप एवं गुण रहित होते हुए भी उसे सुन्दर एवं गुणवान मानती है। पतिव्रता को अपना पति प्राण प्रिय होता है और पत्नीव्रती पति अपनी धर्मपत्नी पर प्राण न्यौछावर करता है। हो सकता है कि इसमें स्वार्थ का भी कुछ अंश मिला हुआ हो पर प्रधानता प्रेम की ही होती है। प्रेम रहित स्वार्थ के लिए एक सीमा तक ही मनुष्य त्याग कर सकता है। पर सच्चा प्रेम जहाँ है वहाँ प्रेमी की आत्मा उसका महान मूल्य स्वयमेव जान लेती है और उसके लिए बड़े से बड़ा बलिदान करना भी सहज हो जाता है।

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    कलियुग का घातक भ्रम

    कलियुग का घातक भ्रम

    हिन्दुस्तान में रहते हुए मुझे एक लम्बा अरसा हो गया। इस बीच में मैंने हिन्दू धर्म ग्रन्थों का बड़ी रुचि के साथ मनन किया है और कितनी ही बातें ऐसी पाई हैं, जो अन्य धर्मों की पुस्तकों में मिलना मुश्किल हैं, हिन्दू धर्म को मानव धर्म कहा जा सकता है। यह एक आचार शास्त्र है, जो मजहबों की बनिस्बत कही ऊँचा है। सनातन वैदिक धर्म इतना परिपूर्ण है कि उसमें दोष निकालना बहुत कष्ट साध्य है।

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    भक्त बनो तो राम भक्त हनुमान जैसा: मोरारी बापू

    भक्त बनो तो राम भक्त हनुमान जैसा: मोरारी बापू

    शनिवार को संत मोरारी बापू ने कहा कि हमें संसार में रहकर प्रभु श्रीराम का नाम जपना है, तो राम भक्त हनुमान की तरह जपें। हनुमान जीवन पर्यंत श्रीराम का नाम जपते रहे। चौदह बरस के वनवास के दौरान हनुमान की श्रीराम से भेंट हुई और वे धन्य हो गए, फिर हनुमान ने कभी प्रभु श्रीराम का साथ नहीं छोड़ा और उनके दुख-सुख के सारथी बने रहे।

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    आत्मा के पांच आवरण

    आत्मा के पांच आवरण

    उपनिषदों में ब्रह्मज्ञान का उपदेश भिन्न-भिन्न प्रकार के अधिकारियों को भिन्न-भिन्न रीति से किया गया है। उस उपदेश से आत्मा की पहचान होती है। आत्मा सत्-चित्-आनन्द स्वरूप है और आत्मा को छोड़कर जो अन्य सकल अनात्म पदार्थ हैं, वे जड़ कहलाते हैं। जो पुरुष आत्मा और अनात्मा के भेद को जानता है उसको आत्मज्ञानी या ब्रह्मवेत्ता कहते हैं। आत्मा सर्वव्यापक है और समस्त पदार्थों का सार वस्तु है। सर्वव्यापक होने से सर्वत्र विद्यमान है, इसलिए खोज करने पर सर्वत्र और सर्वदा मिल सकता है। इसको खोजने का सबसे अच्छा स्थान अपना शरीर है। उसमें वह पाँच आवरणों से ढ़का हुआ है

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    मुस्कान एक मनोवैज्ञानिक आसान

    मुस्कान एक मनोवैज्ञानिक आसान

    मन-मस्तिष्क को सहज स्वाभाविक एवं संतुलित बनाये रहने के लिए हास्य-विनोद नितान्त आवश्यक है। हँसता व्यक्ति ही दूसरे को हँसाते रहने में समर्थ होता है। सुगंधित वस्तुओं के समीपवर्ती वस्तुएँ भी सुगंधित हो जाती हैं, उसी प्रकार हँसमुख स्वभाव वालों का सान्निध्य भी खिन्न और उदास चेहरों पर मुसकान बखेर देता है। प्रसन्नता-प्रफुल्लता की अभिव्यक्ति चेहरे पर खिले गुलाब पुष्प जैसी दीखती है। कुरूप शकल सूरत वाला व्यक्ति भी मुस्कान जुड़ जाने पर सुन्दर लगता और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। मुँह लटकाये खीजते व्यक्ति को देख कर सभी उससे बचने का प्रयत्न करते हैं। अतः हँसी और मुसकान को सफलता का सूचक माना जाता है। इससे निरन्तर नयी शक्ति और स्फूर्ति उभरती रहती है। ऐसे स्वभाव वाले सदा अधिक मात्रा में अधिक अच्छे स्तर का काम करते और सफलतायें अर्जित करते हैं।

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    गीता का विश्व दर्शन

    गीता का विश्व दर्शन

    इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि धर्मग्रन्थों को मात्र पूजापाठ की वस्तु मान लिया गया है। उनके उल्लेखों का वाचन या श्रवण ही पुण्यफल दाता मान कर सन्तोष कर लिया जाता है। यह आरम्भिक जानकारी या विषय वस्तु समझने के लिए किसी ग्रन्थ का पढ़ना, समझना तो आवश्यक है, पर इतने भर से ही यह नहीं मान लेना चाहिए कि अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो गई। यदि ऐसा ही होता तो महत्वपूर्ण ग्रन्थों के मुद्रक, प्रकाशक, विक्रेता उन विषयों के अनुभवी पारंगत भी हो जाते और उनका वही लाभ उठाते जो उन प्रसंगों को जीवन में उतारने वाले उठाते हैं।

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    मोरारी बापू ओरछा में 23 दिसम्बर से कराएंगे श्री राम कथा का रसपान

    मोरारी बापू ओरछा में 23 दिसम्बर से कराएंगे श्री राम कथा का रसपान

    उन्होंने कहा कि कथा में पूरे बुन्देलखण्ड से प्रतिदिन 1 लाख से अधिक भक्तजनों के आने की संभावना है। उन्होंने सुरभि गौशाला ओरछा के भव्य प्रांगण में आयोजित श्री राम कथा में झांसीवासियों से अधिक संख्या में आने का आग्रह किया। इस दौरान जिला धर्माचार्य महन्त विष्णु दत्त स्वामी, नगर धर्माचार्य प. हरिओम पाठक, बसन्त गोलवलकर, लल्लन महाराज, अनुरूद्ध दास महाराज ओरछा, मनोज पाठक, पीयूष रावत, अनिल रावत, आशीष राय, देवेश पाण्डेय, रत्नेश दुबे, पुनीत रावत, रीतेश दुबे, अंचल अड़जारिया, मनीष नीखरा, नीरज राय, शिवशंकर संकल्प, अनिल दीक्षित, घनश्याम चौबे, सोनी कुशवाहा, बन्टू मिश्रा आदि उपस्थित रहे।

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    अविज्ञात को जगाने हेतु विचार खुले रखें

    अविज्ञात को जगाने हेतु विचार खुले रखें

    मानवी बुद्धि जो कुछ भी दिखती समझती है, वह अत्यल्प है। उसे धर्म सत्य ही कहना उचित होगा। यदि तथ्यों को सर्वांगीण जानने, समझने और उसके ज्ञात विज्ञात हर पहलू को पाने जितनी सामर्थ्य रहती होती, तो विदित हो पाता कि यहाँ सीधा चलने पर जो उलटा क्रम दिखाई पड़ता है, उसे अपवाद नहीं कहा जा सकता। सहायता करने वालों को असहयोग ही असहयोग प्रेम बाँटने वाले को घृणा ही घृणा प्रतिदान मिलते भी कई बार देखा गया है। यह सब एक सुनिश्चित विधान के अंतर्गत होता है। इसमें उलटा नियम अथवा आधा कानून जैसी कोई बात नहीं।

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    सज्जनों को सताकर कोई भी नष्ट हो सकता है

    सज्जनों को सताकर कोई भी नष्ट हो सकता है

    नहुष को पुण्य फल के बदले इन्द्रासन प्राप्त हुआ। वे स्वर्ग में राज्य करने लगें। ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आए, ऐसे कोई बिरले ही होते हैं। नहुष भी सत्ता मद से प्रभावित हुए बिना न रह सके। उनकी दृष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी। वे उसे अपने अंतःपुर में लाने की विचारणा करने लगे। प्रस्ताव उनने इन्द्राणी के पास भेजा। इन्द्राणी बहुत दुःखी हुईं। राजा के विरुद्ध खड. होने का साहस उसने अपने में न पाया, तो एक दूसरी चतुरता बरती। नहुष के पास संदेश भिजवाया कि वह ऋषियों की पालकी में जोते और उस पर चढ़कर मेरे पास आवें, तो प्रस्ताव स्वीकार कर लुँगी।

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    सदैव जागरूक रहें

    सदैव जागरूक रहें

    नींद में मनुष्य सोया रहता है तो उसे न अपने शरीर की खबर रहती है न निकटवर्ती घटनाक्रम की। मन भी छुट्टल रहता है उस पर किसी मर्यादा या दिशाधारा का अंकुश नहीं रहता। सपने देखता है तो भी वे बिना सिर पैर के होते हैं। शरीर पर ढके कपड़े भी अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। यहाँ तक कि लज्जा ढकने के कपड़े भी कभी-कभी वदन पर से हट जाते हैं जिसे देखकर देखने वालों को शर्म आती है पर सोया हुआ व्यक्ति इस सब से बेखबर ही रहता है।

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    शिष्ट व्यवहार ही मनुष्यता की शोभा

    शिष्ट व्यवहार ही मनुष्यता की शोभा

    मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण सभ्यता है। असभ्य अथवा अनागरिक व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। समाज में जो भी कष्ट क्लेश, मार-धाड़, लड़ाई-झगड़ा, वाद-विवाद विरोध एवं संघर्ष दिखाई देता है, उसमें से नब्बे प्रतिशत ऐसे लोगों द्वारा उत्पन्न किया होता है जो नागरिकता की भावना से रहित होते हैं।

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    दिव्य अनुदानों का सुयोग बनता है सुअवसर

    दिव्य अनुदानों का सुयोग बनता है सुअवसर

    मनुष्य के अपने पुरुषार्थ का महत्व तो है ही, साथ ही यदि परिस्थितियों की अनुकूलता भी उपलब्ध हो सके तो सफलता और भी अधिक सरल सुनिश्चित हो जाती है। उगता तो बीज ही है और उगाने का श्रेय भी धरती को ही मिलेगा किन्तु वर्षा ऋतु आने पर पौधों को जल्दी उगने और बढ़ने का अवसर मिलता है इस तथ्य से भी सभी परिचित हैं। फूल अन्य महीनों में भी खिलते हैं किन्तु वसन्त में वृक्ष वनस्पतियों को जिस प्रकार फूल कोपलों से लदा देखा जाता है वैसा अन्य किसी महीने में नहीं। शीत ऋतु स्वास्थ्य संवर्धन के प्रयोगों को अपेक्षाकृत अधिक सफल बनाती है। नर्मी के आँधी−तूफान समूची धरती की शीलन सुखाने और बुहारी लगाने का कार्य करते हैं। अन्य महीनों में प्रकृति को वैसा करने की फुरसत ही नहीं रहती।

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    ऊँचा रखें व्यक्तित्व का स्तर

    ऊँचा रखें व्यक्तित्व का स्तर

    अधीरता ओछेपन का चिन्ह है। अपना कुछ निश्चय ही न हो। हवा के साथ उड़ने वाले तिनके की तरह जिस तिस के प्रभाव या प्रवाह में बहते रहा जाय तो बात कुछ बनेगी नहीं। मनुष्य का अपना व्यक्तित्व होना चाहिए और अपना निश्चय सन्तुलन हर दृष्टि से आवश्यक है। उसके बिना न संकटों से उबरना सम्भव हो सकता है और न प्रगति का मार्ग मिलता है। यहाँ तक कि भीतर का खोखलापन सामान्य जीवन को भी कठिन बना देता है। अवास्तविक आशंकाएँ सिर पर छाई रहती हैं और उन्हीं के दबाव से आदमी का कचूमर निकलता रहता है।

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    आध्यात्मिक जीवन के पांच पक्ष

    आध्यात्मिक जीवन के पांच पक्ष

    धर्म वह पक्ष है- जो व्यवहार के सम्बन्ध में दिशा धारण की अन्तः क्षेत्र में प्रतिष्ठापना करता है। क्या करना है, क्या नहीं, इसका एक आदर्शवादी पक्ष भी है। स्वार्थ और कुसंस्कारों से पशुवत् स्वेच्छाचार बरतने की भी एक लहर ज्वार की तरह मन में उठती रहती है। उसे शान्त, समाहित और सन्तुलित करने के लिए अन्तःकरण का देवपक्ष काम करता है। समाज में मानवी मर्यादाएँ और परम्पराएँ भी मौजूद हैं। इस भीतरी और बाहरी उत्कृष्टता की जो छाप मान्यता के रूप में मन स्वीकार करता है उसे व्यक्तिगत धर्म कह सकते हैं। यों सामाजिक और दार्शनिक धर्म की व्याख्या, विवेचना तो शास्त्रों और प्रवचनों द्वारा अवगत होती ही रहती है।

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    सत्य खोजना हो तो दुराग्रह त्यागें

    सत्य खोजना हो तो दुराग्रह त्यागें

    प्रख्यात वैज्ञानिक “आइन्स्टीन” से किसी ने पूछा कि सत्य के स्वरूप के विषय में आपके क्या विचार हैं? आइन्स्टीन ने उत्तर दिया- ‘‘सत्य स्वरूपों से परे है-उसका कोई स्थायी रूप नहीं हो सकता-वह परिवर्तनशील तथा सापेक्ष है। अतएव जिन्हें सत्य की खोज करनी हो उन्हें सदा अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए। पूर्व मान्यताओं एवं विश्वासों से बंधे रहने का अर्थ होगा- उसी अनुपात में सत्य से दूर हटा जना।’’

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    मनुष्य की अनन्त शक्तियां

    मनुष्य की अनन्त शक्तियां

    श्री रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर में थे। एक दिन अनेक भक्तों के बीच उनका प्रवचन चल रहा था। तभी एक व्यक्ति उनके दर्शनों के लिये आया। रामकृष्ण परमहंस उसे ऐसे डाँटने लगे जैसे उसे वर्षों से जानते हों। कहने लगे- “तू अपनी धर्मपत्नी को पीटकर आया है। जा पहले अपनी साध्वी पत्नी से क्षमा माँग, फिर यहाँ सत्संग में आना।”

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    मनोविकारों का शरीर पर प्रभाव

    मनोविकारों का शरीर पर प्रभाव

    कई बार ऐसे रोगी भी देखने में आते हैं जिनका आहार-विहार संयम-नियम सब कुछ ठीक होता है फिर भी उन्हें बीमारी ने घेरे रखा होता है। कई बार उत्तम से उत्तम चिकित्सा करने पर भी, यहाँ तक कि पीड़ित अंगों की शल्य-क्रिया करने पर भी कष्ट से छुटकारा नहीं होता। कितनी ही बार आपरेशन से पूर्व जिस अंग के खराब होने की कल्पना की गई थी वह फाड़-चीर करते समय बिल्कुल निर्दोष पाया गया है और डाक्टरों को अपनी भूल का पश्चाताप करना पड़ा है।

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    सद-प्रेरणाओं का स्त्रोत है प्रेम

    सद-प्रेरणाओं का स्त्रोत है प्रेम

    जीवन में जिन व्यक्तियों ने विशेष विकास और विस्तार पाया है, उसका मूल आधार, अधिकाँशतः प्रेम ही रहा है। बिना प्रेम के किसी क्षेत्र में विकास होना सम्भव नहीं। फिर चाहे वह क्षेत्र लौकिक रहा हो अथवा आध्यात्मिक।

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    पूर्वाग्रह छोड़ें, आत्मिकी का अवलम्बन लें

    पूर्वाग्रह छोड़ें, आत्मिकी का अवलम्बन लें

    मान्यताओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होने पर सत्य के निकट पहुँच पाना सम्भव नहीं हो पाता। ऐसे व्यक्तियों की स्थिति उस मेंढक की तरह होती है जो कुएँ में परिभ्रमण करता, उसकी जलराशि एवं विस्तार को ही अधिकतम मानता रहता है। झरनों, नदियों तथा समुद्रों की अगाध जलराशि, प्रवाह, गहराई एवं विस्तार के चर्चा प्रसंग कुएँ के मेंढक को अवास्तविक लगते हैं। अपने अनुभव एवं जानकारी को ही वह सर्वोपरि महत्व देता है। लगभग ऐसी ही हालत उन तथाकथित विद्वानों बुद्धिजीवियों तथा प्रत्यक्षवाद को ही महत्व देने वाले भौतिक विज्ञानियों की है जो इन्द्रिय ज्ञान के सीमित परिकर में ही चक्कर काटते रहते हैं, जो भी दृष्टिगोचर होता है, उसे ही सब कुछ मानते हैं।

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    संतोष और सुख का अंतर

    संतोष और सुख का अंतर

    सुकरात से किसी ने पूछा- आप एक असंतुष्ट सुकरात होना पसन्द करेंगे या सन्तुष्ट सुअर। ‘सुकरात ने कहा - मुझे असन्तुष्ट सुकरात रहना पसन्द है। क्योंकि मैं अपने असन्तोष को और उसके कारण को जानता तो हूँ। सुअर सुखी रहते हुए भी सन्तोष की महत्ता तक के बारे में कुछ नहीं समझता। इस उत्तर में सुकरात का प्रतिपादन यह है कि बुद्धिमत्ता सबसे बड़ी उपलब्धि है। उसे किसी भी कीमत पर नहीं गँवाया जाना चाहिए और उसे किसी भी कीमत पर कमाने, बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए।

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    पशु प्रवित्तियों का कीजिये परिष्कार

    पशु प्रवित्तियों का कीजिये परिष्कार

    डार्विन विकासवाद के अनुसार प्राणी पशुयोनि से विकसित होते-होते मनुष्य की श्रेणी तक पहुँचा है। हम भारतीय डार्विन के इस दार्शनिक सिद्धान्त में भले ही विश्वास न करें, किन्तु इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हजारों लाखों सालों से मनुष्य और पशु एक दूसरे के संपर्क में रहते आये हैं। उन्होंने एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है और परिणाम यह हुआ है कि पशुओं के स्वभाव में बहुत सी ‘मनुष्यता’ की बातें आ गई हैं तथा मनुष्यों ने पशुओं के अनेक दुर्गुणों को अपना लिया है। कुत्ता, घोड़ा इत्यादि पशुओं की स्वामि-भक्ति और आत्म-बलिदान की ऐसी सैकड़ों सच्ची कहानियाँ सुनने में आई हैं जिन पर अनेक मनुष्यों की मनुष्यता को निछावर किया जा सकता है। इसी प्रकार कभी-कभी मनुष्यों की दुष्टता, स्वार्थ-प्रवृत्ति और वासना-वृत्ति को देखकर कहना पड़ता है कि इनसे तो पशु ही सौ गुने अच्छे हैं।

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    जीवन को भव्य बनाने वाली ब्रह्मविद्या

    जीवन को भव्य बनाने वाली ब्रह्मविद्या

    ईश्वर उपासना का प्रभाव मनुष्य के जीवन निर्माण में किस प्रकार होता है इसको समझने के लिये आत्मा के स्वरूप और उसका परमात्मा के साथ क्या सम्बन्ध है यह जानना बहुत जरूरी है। जब मनुष्य अपने आप को शरीर तथा इन्द्रियों से पृथक देखता है और आत्मिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयत्न करता है तो उसकी बुद्धि में एक नये ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है। वह समझता है कि यह इन्द्रियाँ, यह शरीर आत्मोत्थान के महत्वपूर्ण साधन मात्र हैं अतः इनका सदुपयोग भी करना चाहिये। पर इनके विषयों में आसक्त न होना चाहिये। इस प्रकार धारणा जब तक पक नहीं जाती तब तक मनुष्य को विचार-विभ्रम होता रहता है, पर जैसे ही इस प्रकार की निश्चयात्मक बुद्धि बनी कि यह शरीर तो कोई नष्ट हो जाने वाली वस्तु है वहीं मृत्यु का भय छूट जाता है। भय और प्रलोभनों से मुक्त होना अथवा आत्मा के स्व वश होना ही जीवन-मुक्ति है। इसी का नाम ब्रह्म-विद्या है।

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    प्राणायाम से आत्मिक प्रगति

    प्राणायाम से आत्मिक प्रगति

    प्राणायाम एक ऐसी क्रिया है, जिससे न सिर्फ प्राणवायु की अधिकतम आपूर्ति हमारे अंगों को होती है, वरन् अंतरंगों का भलीभाँति व्यायाम भी हो जाता है। इस प्रकार स्वास्थ्य की दृष्टि से यह उपयोगी तो है ही, इससे आत्मोन्नति भी संभव है। योग का यह एक निर्विवाद सत्य है।

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    बच्चों को दें आध्यात्मिक गुण

    बच्चों को दें आध्यात्मिक गुण

    अभिभावकों, खासकर माता पिता के ऊपर बच्चों में अच्छी आदतें डालने, उन्हें सुयोग्य बनाने का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है और सभी माँ बाप यह चाहते भी हैं कि उनके बच्चे योग्य बनें। किन्तु बच्चों का निर्माण एक पेचीदा प्रश्न है। इसके लिए अभिभावकों में काफी विचारशीलता, विवेक संजीदगी एवं मनोवैज्ञानिक जानकारी का होना आवश्यक है।

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    स्वप्न के रहस्य

    स्वप्न के रहस्य

    प्राचीन यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक हिप्पेक्रेटस का मानना था कि निद्रा के समय आत्मा शरीर से अलग होकर भ्रमण करती है और ऐसे में जो देखती है या सुनती है, वही स्वप्न है। प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो अपनी पुस्तक ‘टाइमिमस’ में स्वप्नों की, दैहिक एवं मानसिक लक्षणों की महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में व्याख्या करते हैं। अरस्तू ने अपनी पुस्तक ‘पशुओं के इतिहास’ में लिखा है कि केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु भेड़, बकरियाँ, गाय, कुत्ते, घोड़े इत्यादि पशु भी स्वप्न देखते हैं।

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    एक सूक्ष्म प्राकृतिक शक्ति है आपका मन

    एक सूक्ष्म प्राकृतिक शक्ति है आपका मन

    इंग्लैंड के एक रसायन शास्त्री आहार सम्बन्धी परीक्षण कर रहे थे। चूहों के एक पिंजरे में से एक चूहे को निकाला गया और उसे सामान्य भोजन न देकर असामान्य मिर्च मसाले और माँस व शराब से बना आहार दिया गया। चूहा जिसकी प्रकृति अब तक शान्त और शीतल थी इस आहार को ग्रहण करने के बास से ही उद्दंड और आक्रामक बन गया। पिंजरे के दूसरे चूहों को उस अकेले ने बुरी तरह सताया और यह सिद्ध कर दिया कि लाग जैसा अन्न खाते हैं उनका मन सचमुच वैसा ही बनता है।

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    उचित वातावरण का चुनाव या निर्माण

    उचित वातावरण का चुनाव या निर्माण

    वातावरण का मानव स्वास्थ्य एवं स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभाव का मूर्धन्य विज्ञानियों ने गहन अध्ययन किया है और पाया है कि ठण्डे क्षेत्रों में प्रकृति के साहचर्य में रहने वाले व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक श्रमशील, सहनशील, बहादुर तथा आत्मनिर्भर होते हैं। उनकी सृजनात्मक क्षमता बढ़ी चढ़ी होती है। इसके विपरीत गर्म जलवायु में निवासरत व्यक्तियों का स्वास्थ्य दुर्बल एवं उत्साह शिथिल होता है। सुविधा-साधनों की अधिकता रहते हुए भी ऐसे क्षेत्रों के बच्चे निरुत्साही तथा स्वभाव से चिड़चिड़े देखे गये हैं।

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    संत शिरोमणि आचार्य जगदीश्ववरानंद महाराज ने भक्तों को किया मंत्रमुग्ध

    संत शिरोमणि आचार्य जगदीश्ववरानंद महाराज ने भक्तों को किया मंत्रमुग्ध

    जो भी मनुष्य इस धरती रूपी ब्रह्मांड में जन्म लेता है यदि वह प्रभु का सिमरन एवं भक्ति प्राप्त करता है तो अपना व परिवार का जन्म सफल करके मोक्ष को प्राप्त होता है उक्त उद्बोधन उजिउदीनपुर ब्लॉक बनीकोडर के तेज बहादुर सिंह के यहां मथुरा वृंदावन से पधारे संत शिरोमणि आचार्य जगदीश्ववरानंद महाराज ने उपस्थित भक्तो को श्रीमद्भगावत कथा सुनाते हुए कही आचार्य ने कहा कि भारत देश ऐसा है जहाँ सभी देवता निवास करते है प्रभु श्रीराम के अवतार के पूर्व भक्त प्रहलाद का जन्म दैत्य राज हिरण्याक्ष के यहां हुआ था कश्यप ऋषि घनघोर तपस्या के बाद मानव जीवन की तृष्णाओं की ओर आकर्षित हुए और दति से विवाह किया दो पुत्र एक कन्या का जन्म हुआ हिरण्य कश्यप के अत्याचार पर भगवान विष्णु ने वध कर दिया

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    अनाचार पर सदाचार की विजय

    अनाचार पर सदाचार की विजय

    पृथ्वी के धरातल पर सब कुछ सामान्य है। जितना ऊँचा उठना होगा अन्तरिक्ष विचरण में उतना ही आनन्द मिलेगा। जमीन पर पड़े खड़े होने वाले को इर्द-गिर्द की चीजें ही दीखती हैं। पर पहाड़ की चोटी पर खड़ा या वायुयान पर चढ़ा व्यक्ति दूर-दूर तक के क्षेत्र का पर्यवेक्षण कर सकता है। यह आँखों की विशेषता नहीं, ऊँचाई पर पहुँचने पर सहज ही मिलने वाली विशालता की उपलब्धि है।

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    क्यों नहीं सफल होती है उपासना ...

    क्यों नहीं सफल होती है उपासना ...

    उपासना देवी-देवताओं की की जाती है। स्वयं भगवान अथवा उसके समाज परिवार के देवी-देवता ही आमतौर से जन साधारण की उपासना के केन्द्र होते हैं। विश्वास यह किया जाता है कि पूजा, अर्चा, जप, स्तुति, दर्शन, भोग, प्रसाद आदि धर्मकृत्यों के माध्यम से भगवान अथवा देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है और जब वे प्रसन्न हो जाते हैं तो उनसे इच्छानुसार वरदान प्राप्त करके अभीष्ट सुख सुविधाओं से लाभान्वित हुआ जा सकता है।

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    स्वास्थ्य संकट के मूल में मानसिक असंतुलन

    स्वास्थ्य संकट के मूल में मानसिक असंतुलन

    शरीर की संरचना ऐसी है कि वह बाहरी हमलों, टूट-फूटों और प्रतिकूलताओं से जूझती और छुट-पुट गड़बड़ियों का मुकाबला करती रहे सके। अन्य प्राणियों को भी प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ता है और आघातों को सहने तथा कष्टकर स्थिति से होकर गुजरने के लिए विवश होना पड़ता है। इतने पर भी उनके शरीर गड़बड़ाते नहीं, पटरी बिठा लेते हैं और टूट-फूट को सम्भाल कर अपनी गाड़ी चलाते रहते हैं। चोटें तो लगती हैं, पर उनमें से किसी को बीमारियों के चंगुल में फंसकर कराहते रहने की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।

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    तीन जन्मों का सम्बन्ध इस जन्म का समर्पण

    तीन जन्मों का सम्बन्ध इस जन्म का समर्पण

    पिछले जिन तीन जन्मों का दृश्य गुरुदेव ने हमें दिखाया उनमें से प्रथम थे सन्त कबीर, दूसरे समर्थ रामदास, तीसरे रामकृष्ण परमहंस। इन तीनों का कार्यकाल इस प्रकार रहा है- कबीर ई. (सन् 1398 से 1518) समर्थ रामदास (सन् 1608 से 1682) श्री रामकृष्ण परमहंस (सन् 1836 से 1896)। यह तीनों ही भारत की सन्त सुधारक परम्परा के उज्ज्वल नक्षत्र हैं। उनके शरीरों द्वारा ऐसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हुए जिससे देश, धर्म, समाज और संस्कृति का महान कल्याण हुआ।

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    कुण्डलिनी योग

    कुण्डलिनी योग

    साधना विज्ञान के क्रमिक सोपानों पर चढ़ते−चढ़ते जब थोड़ा और ऊपर बढ़ते हैं तो कुण्डलिनी योग का उच्चस्तरीय साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना विशेष के विषय में जन−मानस में बड़े व्यापक स्तर पर भ्रांतियां प्रचलित हैं। यह अपरिमित ऊर्जा केन्द्र जो मानवी काय−कलेवर के अन्तराल में सूक्ष्म रूप में अवस्थित होता है, कितना शक्तिशाली है वे विभिन्न साधना−प्रक्रियाओं माध्यम से इस योग साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।

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    अंत समय में भगवान श्री नारायण का नाम मुक्ति का साधन - स्वामी श्रीधराचार्य

    अंत समय में भगवान श्री नारायण का नाम मुक्ति का साधन - स्वामी श्रीधराचार्य

    व्यक्ति यदि अंत समय में भगवान श्री नारायण के नाम का स्मरण कर लेता है श्री वैष्णव दीक्षा ग्रहण कर लेता है। वह नरक में आने का अधिकारी नहीं है ।हिरण्यकश्यप में घोर तप किया प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करके हिरण्य कश्यप अपने को ब्रह्मा मानने लगा और प्रजा में ढिंढोरा पिटवा दिया ।कोई भी यज्ञ नहीं करेगा मेरे शत्रु नारायण का नाम मेरे राज्य में नहीं लेगा हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधु के गर्भ से भक्त प्रहलाद की उत्पत्ति होती है ।

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    ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर

    ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर

    मनुष्य शरीर में किसी भी भाग पर आघात या चोट पहुँचती तो उससे देह का रोम-रोम काँप उठता है। पाँव की अंगुली में चोट लगे तो मस्तिष्क भी उद्विग्न हो उठता है, हाथ भी काम करने से इन्कार कर देते है- कहने का अर्थ यह कि शरीर का अंग-अंग प्रभावित होता है। शरीर की चेतनता का यह एक चिन्ह है। दृश्य और अदृश्य प्रकृति- समूचा ब्रह्माण्ड भी इसी प्रकार एक चेतन पिण्ड है, जिसमें किसी भी छोर पर कुछ घटित होता है तो अन्यान्य स्थानों पर भी उसका प्रभाव परिलक्षित होता है। वैज्ञानिक खोजों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सका है कि जिसे हम जड़ समझते हैं वह वस्तुतः जड़ है नहीं, चेतना उसमें भी विद्यमान है और संसार में घटने वाले घटनाक्रमों से लेकर प्राकृतिक हलचलों का भी उस पर प्रभाव पड़ता है।

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    मानस मसान रामकथा के अन्तिम दिन मोरारी बापू को विदायी देते समय श्रद्धालु फफक पड़े

    मानस मसान रामकथा के अन्तिम दिन मोरारी बापू को विदायी देते समय श्रद्धालु फफक पड़े

    नौ दिन तक डोमरी स्थित गंगा तट मानस मसान रामकथा के चलते रातदिन गुलजार रहा। कथा के अन्तिम दिन मोरारी बापू के जाते ही यहां टिके हजारों साधु संत श्रद्धालु भी अपने नीड़ की ओर लौटने लगे। जिससे पूरा क्षेत्र भी विरान होने लगा। श्रोता पंडाल में कथा की समाप्ति पर भरे नेत्रों से परस्पर क्षमा प्रार्थना करते हुए एक दूसरे को गले लग विदाई देते रहे। यादगार के रूप में सेल्फी भी लिया।

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    ब्रह्म साक्षात्कार, कैसे

    ब्रह्म साक्षात्कार, कैसे

    साधना के दो अंग हैं- चेष्टा और दूसरा त्याग। किसी की प्राप्ति के लिए चेष्टा करनी पड़ती है साथ ही उसके लिए त्याग भी? नदी अपनी सम्पूर्ण चेष्टा से विराट सागर की ओर धावमान होती है उसमें एकरस एक्य की प्राप्ति के लिए। किन्तु उसकी चेष्टा में वह सम्पूर्ण भाव भी परिलक्षित होता है जिसमें वह अपने आप को पद-पद पर विराट के लिए निवेदन करती हुई आगे बढ़ती है। अपनी वर्तमान स्थिति को उसी के लिए क्षण-क्षण में उत्सर्ग करती हैं।

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    वाणी की शक्ति

    वाणी की शक्ति

    गुरु जी ने शिष्य की बात सुनकर कहा—“तुम सबकी बुद्धि खराब हो गई है।” और शाँत हो गये। शिष्य गुरुदेव की इस छोटी बात को भी सहन न कर पाये और थोड़ी ही देर में उनके चेहरे तमतमा गये। अपने लाल−लाल नेत्रों से गुरु जी को घूरने लगे।

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    स्वयं से सद्व्यवहार

    स्वयं से सद्व्यवहार

    किसी विचारक ने कहा है-‘मनुष्य यदि सबसे ज्यादा निष्ठुर और सबसे अधिक क्रूरतापूर्वक व्यवहार किसी के साथ करता है तो स्वयं अपने से ही’। विचारपूर्वक इस कथन को तथ्य की कसौटी पर कसा जाय तो यह उद्धरण सत्य ही सिद्ध होगा। अपने प्रति दुर्व्यवहार के ऐसे अनेकों उदाहरण देखने में आते हैं जिन पर शान्तिपूर्वक देखा जाय तो लगता है कि हम अपनी सर्वाधिक प्रिय वस्तु-जीवन को ही समाप्त कर डालने के लिए उतारू हो गये हैं।

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    सुरक्षा के बीच सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का रविवार को होगा शुभारंभ

    सुरक्षा के बीच सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का रविवार को होगा शुभारंभ

    बताते चलें कि सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा में जनपद के साथ ही दूर-दराज से भक्तगण आएंगे। यहां पर लाखों लोगों की व्यवस्था वाला पंडाल तैयार किया गया है। कथा में लोगों की भीड़ व संवेदनशीलता को देखते हुए सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किये गये है।

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    संत मोरारी बापू का कथा स्थल पर भव्य स्वागत, मानस मसान रामकथा का करेंगे आगाज

    संत मोरारी बापू का कथा स्थल पर भव्य स्वागत, मानस मसान रामकथा का करेंगे आगाज

    मणिकर्णिकाघाट के ठीक सामने गंगा उस पार रेती में राष्ट्र सन्त मोरारी बापू आज से 29 अक्टूबर तक रामकथा रूपी अध्यात्म की गंगा बहायेंगे। कथा में भाग लेने श्रद्धालु भी कथा स्थल पर पहुंच रहे हैं। खास बात यह है कि जिस मंच पर मोरारी बापू कथा सुनाएंगे, उसे देखने के बाद श्रद्धालुओं को एहसास होगा कि जलती चिताओं के बीच मानस कथा हो रही है। कथा आयोजक संत कृपा सनातन संस्थान के मीडिया प्रभारी द्वय जय प्रकाश माली के अनुसार कथा के दौरान दो मंजिला बजड़े में मोरारी बापू रात्रि विश्राम करेंगे।

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    महाकाल का गतिचक्र और अनुशासन

    महाकाल का गतिचक्र और अनुशासन

    ग्रह-नक्षत्रों की अपनी गति, दिशा, परिधि और विधि-व्यवस्था है। जब तक वह निर्धारण ठीक चलता है उनका अस्तित्व बना रहता है। जैसे ही पदार्थ जगत का कोई घटक अथवा प्राणी जगत का जीवधारी व्यतिरेक क करने की घृष्टता करता है वैसे ही उसे अनुशासन हीनता का दण्ड भुगतना पड़ता है।

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    पवित्र अन्तःकरण में प्रभु दर्शन

    पवित्र अन्तःकरण में प्रभु दर्शन

    प्रत्यक्षवादियों की मान्यता है कि जिन चीजों का अस्तित्व है वे प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती हैं। यही स्थूल कसौटी वे ईश्वर के लिए भी प्रयुक्त करते हैं तथा उस पर खरा नहीं उतरने पर वे उस परम सत्ता को मानने से इन्कार करते हैं। गहराई से विचार करने पर ज्ञात होता है कि ईश्वरीय सत्ता का परिचय पाने के लिए बनाया गया यह माप दण्ड कितना उथला, अविवेकपूर्ण एवं अवैज्ञानिक है।

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    सनक से बचें, विवेक न खोएं

    सनक से बचें, विवेक न खोएं

    सनकें जब अपने पूरे उभार पर होती है तो वे अपने वाहन को इस कदर आवेश ग्रस्त कर देती है और विश्वासों की इतनी गहरी भूमिका में उतार देती है कि वह बेचारा सम्भव असम्भव का भी भेद भूल जाता है अपनी तर्क शक्ति गँवा बैठता है और जो कुछ भी उसे सनक ने मान बैठने के लिए कहा था उन्हीं पर पूरा विश्वास करने लगता।

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    कर्मण गहनोगति

    कर्मण गहनोगति

    ज्योतिपाद ने एक क्षण के लिए दृष्टि ऊपर उठाई, उनकी आत्मा कोई सत्य पाना चाहती हो- दूसरे ही क्षण वे बोले आत्मदेव! सन्तान से सुख की कामना करना व्यर्थ है, मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुःख पाता है, सन्तान तो अपने आप में ही एक कर्त्तव्य भार है उसके हो जाने से दाम्पत्य प्रेम कम हो जाने से लेकर संसार के निर्द्वंद्व विचरण का सारा आनन्द हो समाप्त हो जाता है। तुम व्यर्थ ही इस झंझट में मत पड़ो।

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    आत्मा का अनंत सामर्थ्य

    आत्मा का अनंत सामर्थ्य

    योग की सिद्धियाँ और विभूतियाँ प्रसिद्ध है। योग शास्त्र के दक्षिणमार्गी और वाममार्गी ग्रन्थों में इस प्रकार की विभूतियों के कारण और विधानों को विस्तार पूर्वक बताया गया है। जिन लोगों ने उस मार्ग पर चलते हुए जितनी मंजिल पार की है उनमें उस साधना विज्ञान से संलग्न अनेकों साधक अपने में कुछ विशेष प्रकार की सूक्ष्म शक्ति संग्रह करने में समर्थ होते है और उसका लाभ स्वयं उठाते अथवा दूसरों को देते रहते है। यह प्रत्यक्ष तथ्य है। प्राचीन काल में ऐसे अगणित साधक सर्वत्र दृष्टि गोचर होते थे। यह ऋषियों का देश ही था। यह अध्यात्म विद्या का गौरव सभी को विदित था और सभी उसके साथ अपने को किसी न किसी रूप में संबद्ध रखने का प्रयत्न करते थे।

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    ईश्वर प्राप्ति को त्यागें मनोविकार

    ईश्वर प्राप्ति को त्यागें मनोविकार

    अधिकांश लोग बुढ़ापे को मौत का पैगाम, जीवन की अनुपयोगिता का अवसर, अक्षमता अशक्ति का सूचक मानकर जिन्दगी के दिन गिन-गिन कर काटने लगते हैं। उन्हें अपनी शक्तियाँ धीरे-धीरे क्षीण होती जान पड़ती हैं। कोई महत्वपूर्ण कार्य करने का उत्साह मन में नहीं रहता। वरन् बुढ़ापे की पराधीनता, अंग शैथिल्य, बीमारी, रोग, क्लान्ति, असमर्थता आदि की कल्पनायें कुछ कम भयावह नहीं होती। इस रूप में बुढ़ापे की कल्पना करने वाले व्यक्ति के लिए सचमुच वृद्धावस्था एक अभिशाप और नारकीय यन्त्रणा ही सिद्ध होती हैं।

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    शुभ कार्य दिखावे के लिए न करें

    शुभ कार्य दिखावे के लिए न करें

    प्राचीन काल की अपेक्षा वर्तमान में शुभ कार्यों की प्रवृत्ति ही कम होती जा रही है। जो थोड़ी सी शुभ प्रवृत्तियाँ होती हैं, उनमें भी एक बड़ी खराबी घुस गई है। दिखावे की। मनुष्य काम थोड़ा करता है पर दिखावा ज्यादा करता है जिससे लोग उसकी प्रशंसा करें। हृदय की प्रेरणा वहाँ काम नहीं करती नजर अपनी, इससे उसके फल में कमी होना स्वाभाविक है, जीवन दिनों दिन नकली-सा बनता जा रहा है, अंदर कुछ है तो बाहर बोलना व आचरण करना उससे भिन्न प्रकार का है। भावना शून्य, धर्माचरण का फल हो भी क्या सकता है? पर आजकल धर्माचरण प्रायः दिखावे के लिए ही किया जाता है अतः वास्तव में वह धर्माचरण नहीं होकर ढोंग या मायाचार है।

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    सबसे शक्तिशाली है करुणा

    सबसे शक्तिशाली है करुणा

    गायत्री महामन्त्र में सन्निहित ऋतम्भरा प्रज्ञा का आलोक ही नवयुग का आधार भूत कारण बनेगा। नवयुग के समस्त सूत्र संकेत एवं सन्देश महाप्रज्ञा में बीज रूप में विद्यमान हैं। इस आलोक को जन-जन तक पहुँचाने के लिये इन दिनाँक बड़े गायत्री शक्ति पीठों मझले प्रज्ञा पीठों और छोटे प्रज्ञा मन्दिरों का निर्माण हो रहा है। इनमें से प्रज्ञा मन्दिर सबसे सस्ता और हर गाँव में अति सरलतापूर्वक बन जाने योग्य है। प्रयत्न यह होना चाहिये कि यह छोटे देवालय हर गाँव में बन सकें और उनके माध्यम से युगान्तरीय चेतना का आलोक जन-जन के अन्तराल तक पहुँचाया जा सकना सम्भव हो सके।

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    मन की बिमारियों का करें उपचार

    मन की बिमारियों का करें उपचार

    हताश रहना तथा अकारण किसी बात को लेकर भयभीत रहना (डिप्रेशन एण्ड फोबिया) यह दो बीमारियाँ आज कल नई सभ्यता की देन के रूप में बढ़ती चली जा रही हैं। इस तरह के बीमार सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्यों के प्रति अलगाव की सी वृत्ति रखते हैं। बात-बात में चिढ़ पड़ते या उबल उठते हैं। गर्म हो जाने के कुछ ही देर बाद इतने निराश हो जायेंगे कि रोने लगेंगे। इस तरह के बीमारों के लिए “मनोविज्ञान चिकित्सा” ‘रिक्रियेशनल’ अथवा ''एक्यूपेशनल'' थैरेपी चिकित्सा का प्रयोग करती है। रोगी की मानसिक प्रसन्नता और स्थिरता के लिए उसे किस प्रकार के वातावरण में रखा जाये, कैसे बातचीत की जाये, क्या सुझाव और परामर्श दिये जायें? इन सब के पूर्व उसके पिछले जीवन की सारी गुप्त-अगुप्त बातें बता देने के लिए कहा जाता है इस प्रकार आधुनिक मनोविज्ञान चिकित्सक भी यह मानते हैं कि रोगों की जड़ें उसके कुसंस्कार होते हैं जो एक लम्बे अर्से से अन्तरमन में पड़ी फल फूल रही होती हैं।

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    नवमी विशेष : व्यक्तित्व परिष्कार में मंत्र शक्ति का योगदान

    नवमी विशेष : व्यक्तित्व परिष्कार में मंत्र शक्ति का योगदान

    सृष्टि का कारण भूत तत्व “ओंकार”शब्द को बताया गया है। सूक्ष्म जगत में नाद-ब्रह्म के रूप में इसी की प्रधानता है, जब कि दृश्य जगत के क्रिया-कलाप स्थूल शब्द पर आधारित हैं। ‘ओऽम्’ वह कर्णातीत ध्वनि हैं, जिसे सूना नहीं जा सकता है, परन्तु अनुभव किया जा सकता है। आध्यात्म शास्त्रों में इसे ब्रह्म वाचक बताया गया है। नादानुसंधान में साधक इसी एक में. का आश्रम लेते हैं। यही प्रकृति-पुरुष का आदि समागम भी है और उसी उपक्रम में निरन्तर चलते रहने से सृष्टि क्रम चलता रहता है। गायत्री महामंत्र का बीज भी यही है। ‘ॐ’ से तीन व्याहृतियां उत्पन्न हुई। प्रत्येक से तीन-तीन शब्द प्रस्फुटित हुए जैसे कि बीच से अंकुर, पौधा और पत्तों फूल फलों से विकसित हुआ वृक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री को वृक्ष और “ॐ” को उसका बीच कहा जा सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों के मंत्रोच्चारण से काय कलेवर के अन्तराल में विद्यमान 24 शक्ति केन्द्रों का जागरण होता है और उस आधार पर अनेक ऋद्धि-सिद्धियों का विभूतियों का वैभव हस्तगत होता हैं। यही समूचा लाभ प्रकारान्तर से अकेले “ओंकार’ मंत्र के जप से भी हस्तगत हो सकता है।

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    व्यक्तित्व को ''ओछा'' नहीं ''महान'' बनाने का प्रयास करें

    व्यक्तित्व को ''ओछा'' नहीं ''महान'' बनाने का प्रयास करें

    व्यक्तित्व का प्रभावशाली होना बड़ी से बड़ी सम्पदा या योग्यता से कम मूल्य का नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को किसी से विशेष स्वार्थ या लगाव है तो बात दूसरी है, नहीं तो यदि कोई किसी से प्रभावित होता है तो उसका मूल आधार उसका व्यक्तित्व ही होता है। शरीर का सुडौल या रूपवान् होना, दूसरों को कुछ हद तक प्रभावित करता है, वस्तुतः सच्चा प्रभाव तो उसके उन लक्षणों का पड़ता है जो उसके मन की भीतरी स्थिति के अनुरूप क्रिया और चेष्टाओं से पल-पल पर झलकते रहते हैं।

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    साधना से संभव है शक्ति कोशों का उत्कर्ष

    साधना से संभव है शक्ति कोशों का उत्कर्ष

    लुंका में जबर्दस्त बाढ़ आई हुई थी। सारा नगर कुछ ही क्षणों में जलमग्न हो जाने वाला था। इंजीनियरों की सारी शक्ति निष्क्रिय हो गई, सब पाताल समाधि की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय कुछ व्यक्तियों ने फ्रीडियन नामक साधु से जाकर प्रार्थना की- महात्मन्! इस दैवी प्रकोप से बचाव का कुछ उपाय आप ही कीजिये। कहते हैं, महात्मा फ्रीडियन ने ओसर नदी की धारा योग बल से मोड़ दी और नगर को डूबने से बचा लिया।

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    गायत्री शक्ति तत्व विवेचना

    गायत्री शक्ति तत्व विवेचना

    देवी भागवत पुराण में एक बड़े महत्त्वपूर्ण उपाख्यान का उल्लेख है, जिसमें गायत्री उपासना की महत्ता को सर्वोपरि बताया है। इस उपाख्यान में इस शंका का समाधान किया गया है कि गायत्री के रहते अन्य देवताओं अथवा मन्त्रों का महत्व क्यों दिया जाता है? उपाख्यान में अनादि मन्त्र गायत्री को ही बताया गया है और उसे सर्वोपरि प्रतिपादित किया गया है।

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    शक्ति साधना का महापर्व है नवरात्र

    शक्ति साधना का महापर्व है नवरात्र

    धर्म शास्त्रों में कहा गया है मां जगदम्बा ही जगत की पालक हैं संहारक हैं और रचनाकार भी हैं मां दुर्गा ही अपने से पांचो तारे (पंचभूत-आकास, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) आदि को उत्पन्नकर इस संसार की रचना करती है। दुर्गा ही आदि शक्ति की स्वरुप हैं। प्रकृति तथा जगत के सम्पूर्ण कण-कण में समायी हुयी हैं। समस्त जीवों की चेतना है पृथ्वी की धारणा शक्ति है तो जल में शीतलता है। अग्नि में उष्णता है सूर्य के प्रकाश में भी सम्मिलित है। यही कारण है कि शक्ति की साधना का महापर्व नवरात्र को कहा जाता है।

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    चेतना के जड़ भाग पर उच्चस्तरीय सत्ता का अनुशासन

    चेतना के जड़ भाग पर उच्चस्तरीय सत्ता का अनुशासन

    मनुष्य और मनुष्य के बीच पाई जाने वाली उदार आत्मीयता, मैत्री, सहानुभूति एवं सेवा सहकारिता को एक सीमा तक ही तर्क संगत ठहराया जा सकता है। उस सीमा तक जहाँ आदान-प्रदान में लाभदायक परिणाम की आशा अपेक्षा की जाती है। जहाँ इस कसौटी पर मैत्री खोटी सिद्ध होती है वहाँ तर्क तुरन्त पीछे हटने या उपेक्षा बरतने का सुझाव देता है। तर्क बुद्धि पर निर्धारित है और बुद्धि भौतिक स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करती है। दीन-दुखियों की सेवा, सहायता करने में जो समय, श्रम एवं मनोयोग लगता है उसे तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता। भावनाएं तर्क से ऊपर हैं उन्हीं के दबाव से परमार्थ की बात सोची जा सकती है और उसे चरितार्थ करने की हिम्मत जुटाई जा सकती है।

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    सार्वभौम सार्वजनीन - माँ की उपासना

    सार्वभौम सार्वजनीन - माँ की उपासना

    माँ बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती, पहले वह उसका रस, रक्त और हाड़-माँस से निर्माण भी करती है, पीछे उसके विकास, उसकी सुख-समृद्धि और समुन्नति के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। उसकी एक ही कामना रहती है, मेरे सब बच्चे परस्पर प्रेमपूर्वक रहें, मित्रता का आचरण करें, न्यायपूर्वक सम्पत्तियों का उपभोग करें, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का कारण न बनें। चिरशान्ति, विश्व-मैत्री और ‘‘सर्वे भवंतु सुखिनः” वह आदर्श है, जिनके कारण माँ सब देवताओं से बड़ी है।

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    आत्मवत सर्वे भूतेषु

    आत्मवत सर्वे भूतेषु

    आज वे राजगृह के स्वर्णकार के द्वार पर खड़े थे। स्वर्णकार कोई आभूषण बनाने के लिये स्वर्ण के छोटे-छोटे गोल, दाने बना कर ढेर करता जा रहा था। द्वार पर खड़े मेतार्य को देखा तो उसका हाथ वही रुक गया “ अतिथि देवोभव “ कहकर उसने मुनि मेतार्य का हार्दिक स्वागत किया। उनकी भिक्षा का प्रबन्ध करने के लिए जैसे ही वह अन्दर गया वृक्ष पर बैठे पक्षी उतर कर वहाँ आ गये जहाँ स्वर्णकार सोने के दाने गढ़ रहा था। उन्होंने इन दानों को अन्न समझा सो जब तक स्वर्णकार वापस लौटे सारे दाने चुग डाले और उड़कर डाली में जा बैठे।

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    कैसे करें मनोभूमि को परिकृष्ट ....

    कैसे करें मनोभूमि को परिकृष्ट ....

    इन चार आधारों का व्यावहारिक रूप यह हो सकता है कि जब भी शरीर शुद्धि के उपरान्त भजन के लिए बैठा जाय तो अपना निर्धारित कर्म काण्ड करते समय इस भावना को प्रबल किया जाय कि हम और ईश्वर दोनों अति समीप और अति घनिष्ठ बन कर बैठने वाले हैं और दोनों की द्वैत सत्ता के एकीकरण का आधार जुटाया जा रहा है। शरीर शुद्धि इसलिये आवश्यक है कि उसके साथ मन की शुद्धि का सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। मलीन स्थान, मलीन काया, मलीन वस्त्र मलीन उपकरण, यदि पूजा के अवसर पर भी बने रहें तो मन में भी मलीनता की ही घटा छाई रहेगी। इसलिये न केवल शरीर ही शुद्ध करना चाहिए वरन् पूजा के स्थान एवं उपकरणों को भी अधिक से अधिक स्वच्छ करने का प्रयत्न करना चाहिए।

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    प्रेम किससे और भक्ति किससे

    प्रेम किससे और भक्ति किससे

    जीवन का स्वरूप क्या हो? भविष्य में किस दिशा में बढ़ा जाय? इसका निर्धारण करने के लिए जिस अन्तराल से संदेश मिलते हैं, उस पर आकांक्षाओं की प्रधानता रहती है। इच्छाओं को अनुचित ठहराने ओर सही राह पर लाने में बुद्धि का उतना योगदान नहीं होता जितना भावनाओं का। बुद्धि तो राज दरबारियों की तरह शासक की हाँ में हाँ मिलाने लगती है। उसी का समर्थन करती है। वही उपाय बताती है जैसी कि मालिक की मर्जी होती है।

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    अध्यात्म से पाएं भय पर विजय

    अध्यात्म से पाएं भय पर विजय

    कहते हैं कि अमेरिका के इतिहास में ऐसा भयंकर तूफान कभी भी नहीं आया जैसा कि 19 मई सन् 1780 को आया था। इतिहासकार ह्वीटियर ने उसे “महान भयानकता का अविस्मरणीय दिन” लिखा है। ये न्यूयार्क से शुरू हुआ था और उसने पेन्सिलवानियाँ, कनेक्टीकट, रोड़ द्वीप- मैसाचूसेट्स वरमार, हैम्पशायर, पार्टलैण्ड आदि का सुविस्तृत भू-भाग अपने अंचल की काली छाया में ढक लिया था। कितने मरे और कितनी बर्बादी हुई इसका लेखा-जोखा पूरी तरह तो नहीं लगाया जा सका, पर इतना निश्चित था कि लगभग हर व्यक्ति अपने को मौत के शिकंजे में कसा हुआ अनुभव करता था। अब मरे तब मरे की कल्पना में उस क्षेत्र के हर निवासी की तब तक आंतें इठती ही रहीं जब तक कि यह सर्वनाशी तूफान टल नहीं गया।

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    समर्पण का अर्थ है 'अहम्' का विसर्जन

    समर्पण का अर्थ है 'अहम्' का विसर्जन

    पूजा और दान के बाद आरंभ होता था स्वाध्याय। इसके उपरान्त वे राज्य की समस्याओं को सुलझाने के लिए मंत्री-परिषद के सदस्यों से परामर्श करते। अपनी समस्याओं को उनके पास सुलझाने के लिए आए नागरिकों से भेंट करते, उसके कष्ट सुनते और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे। इन सभी कार्यों के निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिए ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुँच। उनको यही समय मिलता था भोजन के लिए। कष्ट साध्य जीवन कार्यों में लगे रहने के कारण उन्हें एक प्रकार का सुख मिलता था और वे इस सुखानुभूति में अपनी कष्ट साध्य दिनचर्या की असुविधाओं को भूलकर उसके अभ्यस्त हो गए थे।

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    विनाश के नियम

    विनाश के नियम

    यह वृत्तान्त सुन-सुनकर पिप्पलाद का मन देवताओं के प्रति घृणा से भर गया। वे सोचते, देवता कितने स्वार्थी हैं? अपने स्वार्थ के लिए ही उन्होंने मेरे पिता से अस्थियाँ तक माँग लीं। देवगण कितने निर्लज्ज हैं? अपने स्वार्थ के लिए उन्हें मेरे पिता से उनकी अस्थियाँ माँगने में भी लज्जा नहीं आई। स्वार्थी व्यक्ति निर्लज्ज हो ही जाता है।

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    आत्मिक विकास के लिए स्वप्नों का उपयोग

    आत्मिक विकास के लिए स्वप्नों का उपयोग

    । मन मस्तिष्क के यही क्रिया-कलाप स्वप्न के रुप में दिखाई देते हैं । मनोविज्ञान अब तक इसी रुप में स्वप्न को व्याख्यायित करता रहा हे । किन्तु अब मनावैज्ञानिक के अनुसार स्वप्न का एक और पक्ष उद्घाटित हुआ है , जिन्हें अतीन्द्रिय स्वप्न कहा जाता है । रुसी मनःशास्त्री पावलोव के अनुसार मनुष्य का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं और सम्वेदनाओं का भण्डार है , उसे सामान्य रीति से समझ पाना अति दुष्कर है । इस सर्न्दभ में सन् 1883 में वोस्टल ग्लोव नामक अमरीकी समाचार पत्र के सम्बाददाता द्वारा प्रालेप द्वीप में भयन्कर ज्वालामुखी विस्फाट का स्वप्न दृश्य देखने और उसे खबर के रुप में प्रकाशित होने की घटना उल्लेखनीय है। इस तरह की और भी अगणित घटनाएँ है , जिनमें लोगों ने स्वप्न द्वारा किसी सुदूर स्थान में घट रही घटनाओं की जानकारी प्राप्त की , भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का आभास प्राप्त किया और हजारो मील दूर स्थित अपने प्रियजनों के हाल जाने ।

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    दोहरा लाभ देती है निष्काम भक्ति

    दोहरा लाभ देती है निष्काम भक्ति

    सुख और शान्ति के स्थल तलाश करने के लिए लोग जगह−जगह भटकते रहते हैं। कोई एकान्त में कोई नदी पहाड़ों के प्राकृतिक दृश्यों में; कोई तीर्थ पुरियों में प्रसन्नता एवं शान्ति प्रदान करने वाली परिस्थितियाँ ढूँढ़ते हैं, पर वस्तुतः आनन्द का स्थान वही है जहाँ प्रेमीजन बसते हैं। अपने से प्रेम करने वाले, सहानुभूति रखने वाले, सान्निध्य से प्रसन्नता अनुभव करने वाले स्वजन जहाँ रहते हैं वहाँ मनुष्य दौड़−दौड़कर जाता है। परदेश में प्रचुर जीविका एवं सुख सुविधा होते हुए भी कितने ही व्यवसायी अपनी जन्म भूमि के छोटे से गाँव में पहुँचने को लालायित रहते हैं। अपने प्रियजन जहाँ रहते हैं वस्तुतः वह स्थान स्वर्ग के समान ही आनन्ददायक लगता है जननी जन्मभूमि को स्वर्गादपि गरीयसी कहा गया है। इस आस्था में प्रेम भावना ही एकमात्र आधार है।

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    भ्रम-जंजाल में फंसकर देवताओं को बुरा-भला न कहें

    भ्रम-जंजाल में फंसकर देवताओं को बुरा-भला न कहें

    ऋषिगण श्रद्धा की गंभीरता देखकर विवश हो गये और शिव को विवाह करने के लिए विवश होना पड़ा। अनेक साधक ऐसे ही उतावले होते हैं, वे थोड़े बहुत दिनों उलटे सीधे जंत्र-मंत्रों की हेराफेरी करके सिद्ध पुरुष बनना चाहते हैं और कुछ हाथ न लगने पर पूरे साधना विज्ञान को ही कोसने लगते हैं। भविष्य के लिए तो वे श्रद्धा विश्वास ही गवाँ बैठते है। ऐसे लोग यदि उतावली न करें, अधिक कोई साधन न करे, तो भी कम-से-कम आशा तो बनी रहेगी। उतावली में वह भी चली जाती है। गायक वादक अभिनेता अपना अभ्यास नित्य जारी रखते हैं। पहलवानों और सैनिकों को भी नियमित अभ्यास का आश्रय लेना पड़ता है।

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    नैतिकता और धर्म धारणा

    नैतिकता और धर्म धारणा

    उदाहरण के लिये सम्पन्नता आर शिक्षा की दृष्टि से अमेरिका को इन दिनों मूर्धन्य माना जाता है। वैज्ञानिक प्रगति और सुविधा साधनों की दृष्टि से भी उसे विश्व के राष्ट्र समुदाय में प्रमुखता मिली हुई है। इतने पर भी वहाँ नीतिमत्ता को जन-जीवन में वैसा स्थान नहीं मिल सका जैसा कि सम्पन्नता और शिक्षा को ही सब कुछ मानने वाले कहते हैं।

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    ज्ञान का आदि स्त्रोत है जिज्ञासा

    ज्ञान का आदि स्त्रोत है जिज्ञासा

    आनन्दमय अमृत की कामना सहज जिज्ञासा की कारण बनी। विषय भोगों की क्षणभंगुरता ने मनुष्य को शाश्वत आनन्द की प्राप्ति के लिए अभिप्रेरित किया। बहिर्मुखी चेष्टाओं तथा विषयों के भोग से अतृप्ति तथा असंतुष्टि ही हाथ लगी। आनन्द के अन्तःस्रोत ने मनुष्य को आत्म अन्वेषण के लिए अभिमुख किया। परमानन्द से युक्त अपनी ही आत्म-सत्ता है, जिस दिन यह बोध हुआ, मानव को आध्यात्मिक खोज की दिशा में आगे बढ़ने का एक महत्वपूर्ण सम्बल हाथ लग गया। साधन शरीर और मन है तथा साध्य भीतर बैठा है, जिसका विराट् स्वरूप परब्रह्म के रूप में चारों ओर विद्यमान है, यह ज्ञान होते ही मनुष्य ने सोचा- बाहर भटकने से विषयाकर्षणों में अपनी सामर्थ्य गँवाने से क्या लाभ? अन्तःस्रोत को ही कुरेदा-उभारा जाय तथा उसके अगणित अनुदानों को ही समेटकर अपनी झोली भर ली जाय, इस चिन्तन ने आत्म-विज्ञान को जन्म दिया।

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    प्रभु भजन की अनुकम्पा

    प्रभु भजन की अनुकम्पा

    भज इत्येव वै धातुः सेवायाँ परिकीर्तिता। तस्मात्सेवाबुधै प्रौक्ता भक्तिः साधन भूयसी॥ श्लोक का तात्पर्य है कि-’भज’ धातु का अर्थ सेवा है। (भज्-सेवायाँ) इसलिये बुध जनों ने भक्ति का साधन सेवा कहा है। ‘भजन’ शब्द भज धातु से बना है जिसका स्पष्ट अर्थ सेवा है। ‘ईश्वर का भजन करना चाहिए’ जिन शास्त्रों ने इस महामंत्र का मनुष्य को उपदेश दिया है उनका तात्पर्य ईश्वर की सेवा में मनुष्य को प्रवृत्त करा देना था। जिस विधि व्यवस्था से मनुष्य प्राणी ईश्वर की सेवा में तल्लीन हो जाय वही भजन है। इस भजन के अनेक मार्ग हैं। अध्यात्म मार्ग के आचार्य ने देश काल और पात्र के भेद को ध्यान में रख कर भजन के अनेकों कार्यक्रम बनाये और बताये हैं।

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    करें आत्मिक सफलता प्राप्ति का प्रयास

    करें आत्मिक सफलता प्राप्ति का प्रयास

    कुछ व्यक्ति धन संग्रह को सफलता मानते हैं। कुछ मान प्रतिष्ठा को सफलता की अन्तिम सीढ़ी मानते हैं किंतु यदि तुम गंभीर चिंतन करके देखो तो अन्त में तुम्हें यही प्रतीत होगा कि परमानन्द की प्राप्ति ही वास्तविक सफलता है। आपने कितना ही धन संग्रह किया हो किन्तु क्या मालूम वह कब जाता रहे। हमें स्मरण रखना चाहिए कि स्थायी वस्तु हमारी आध्यात्मिक सफलता ही है, वही वाँछनीय है।

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    आत्मा और उसकी अद्वैत अनुभूतियाँ

    आत्मा और उसकी अद्वैत अनुभूतियाँ

    आत्मा और उसकी अद्वैत अनुभूतियाँ सन् 1643 को रात, द्वितीय महायुद्ध, पैसिफिक सागर में तेरहवीं एयर फोर्स बटालियन के कमाण्डर जनरल नेथान एफ र्ट्वनिंग दुर्भाग्यवश युद्ध के दौरान अपने बेड़े से अलग पड़ गये। वे एस्पेराइट सन्तों एयरवेज के लिए अपने चौदह साथियों के साथ रवाना हुये थे। युद्ध के दिन थे ही बहुत खोज की गई पर उनका व उनके साथियों का कुछ भी पता नहीं चला।

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    जो निरंतर देता है, वह निर्बाध पाता है

    जो निरंतर देता है, वह निर्बाध पाता है

    धरती बोली वृक्षों मैं तुम्हें खाद देती हूँ, पानी देती हूँ, उससे अपने आपको तृप्त करो, किसी को दो मत, पर वृक्ष ने कहा नहीं माँ मुझे देने दो। उसने फूल दिये, फल दिये, पत्ते दिये, सूख रहा था वृक्ष तब भी उसे यही कामना थी कोई आये मेरी सुखी लकड़ियाँ ले जाकर अपना काम चलाये।

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    मनीषा तपे और खरी उतरे

    मनीषा तपे और खरी उतरे

    मनीषा का काम वही है। वह भटकती है और न अपने प्रभाव क्षेत्र में किसी को यथार्थता से अनजान होने के कारण भटकने देती है। दीपशिखा जहाँ अपने को प्रकाशवान रखती है, ज्योति का प्रतिनिधित्व करती है, वहाँ यह उत्तरदायित्व भी उठाती है कि भटकाव के पैर न टिकने दें। यथार्थता से किसी को अपरिचित न रहने दें। इतना बन पड़ें तो समझना चाहिए-आधी समस्याओं का हल हो गया।

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    अध्यात्म के आधार : साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा

    अध्यात्म के आधार : साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा

    कुछ समय भी नियमित रूप से आत्म−कल्याण के कार्यों के लिए हमें लगाना चाहिए। प्रातःकाल आँख खुलने से लेकर चारपाई छोड़ने में हर मनुष्य को थोड़ा बहुत समय लगता है। आँख खुलते ही कोई चारपाई छोड़कर उठ खड़ा नहीं होता वरन् कुछ समय चेतना प्राप्त करने, खुमारी दूर करने में हर किसी को लगाना पड़ता है। जाड़े के दिनों में तथा बुढ़ापे की अवस्था में तो यह चारपाई पर पड़े रहने का समय बहुत लम्बा होता है। इस कार्य को आत्म−कल्याण की साधना में लगाते हुए किसी को कोई अड़चन न होनी चाहिए। यह समय भगवान के स्मरण में लगाना चाहिए। (1) भगवान् के हमारे ऊपर किये उपकार, उनकी दी हुई अनेक सुविधाओं का बाहुल्य, अनेक कठिनाइयों में उपलब्ध होती रहने वाली उनकी अदृश्य सहायताओं का बार-बार चिंतन करना चाहिए। अपनी व्यक्तिगत शक्ति स्वल्प है, जो सफलताऐं मिली हैं उसमें अपना श्रेय न मानकर ईश्वर की ही अनुकम्पा माननी चाहिए और अहंकार को तनिक भी न पनपने देना चाहिए।

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    भगवन बुद्ध के आध्यात्मिक उपदेश

    भगवन बुद्ध के आध्यात्मिक उपदेश

    भगवन बुद्ध के आध्यात्मिक उपदेश

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    करें अपने मस्तिष्क की सुरक्षा

    करें अपने मस्तिष्क की सुरक्षा

    करें अपने मस्तिष्क की सुरक्षा

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    आपत्तियों से विचलित न हों

    आपत्तियों से विचलित न हों

    मनुष्य के जीवन में विपत्तियाँ, कठिनाइयाँ, विपरीत परिस्थितियाँ, हानियाँ और कष्ट की घड़ियाँ भी आती ही रहती हैं। जैसे रात और दिन समय के दो पहलू हैं वैसे ही सम्पदा और विपदा सुख और दुख भी जीवन रथ के दो पहिये हैं।

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    कृष्ण भक्ति और प्रेम-साधना

    कृष्ण भक्ति और प्रेम-साधना

    मोह और प्रेम में वही अन्तर है जो काया और छाया में होता है। छाया तो काया से मिलती-जुलती तो होती है पर उसमें न तो जीवन होता है और न बल। फोटो देखकर आभास तो मूल मनुष्य का होता है पर उस कागज के टुकड़े से प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। मोह में जलन भर होती है पर वह प्रकाश और उल्लास नहीं होता जो प्रेम में पाया जाता है।

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    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, महत्व व शुभ मुहूर्त

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, महत्व व शुभ मुहूर्त

    शास्त्रों की मानें तो भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। उस समय चंद्रमा वृष राशि में व सूर्य सिंह राशि में था। इसलिए श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भी इसी काल में मनाया जाता है। इस साल जन्माष्टमी 14 अगस्त की शाम 7.45 बजे शुरू होकर 15 अगस्त की शाम 5.40 बजे समाप्त होगी।

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    मन और स्वास्थ्य के बीच संबंध

    मन और स्वास्थ्य के बीच संबंध

    शरीर पर मन का क्या प्रभाव उत्पन्न होता है, इसकी चर्चा गत अंक के दो लेखों में की जा चुकी है। यदि मन में निराशा, क्षोभ, क्रोध आवेश, चिन्ता, भय, शोक जैसे भाव बने रहें तो स्वास्थ्य सुधार का लाख प्रयत्न करने पर भी शरीर की स्थिति दिन−दिन खराब होती जावेगी और कोई रोग न होने पर भी यह मनोविकार ही अकाल−मृत्यु का कारण बन जावेंगे। यह तथ्य पूर्णतया विज्ञान सम्मत हैं। भूतों के भय−भ्रम से डरकर कई व्यक्ति मरते एवं मरणासन्न स्थिति तक पहुँचते हुए देखे गये हैं। ऐसी कितनी ही घटनाओं में उस विपत्तिग्रस्त व्यक्ति का भय और भ्रम ही आपत्ति का एकमात्र कारण सिद्ध हुआ है।

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    तप सिद्धि की शक्ति

    तप सिद्धि की शक्ति

    गृहस्थाश्रम का अंत निकट आ चला किंतु महाराज दिलीप को कोई संतान नहीं हुई। वानप्रस्थ ग्रहण करने से पूर्व राज्य के लिये योग्य उत्तराधिकारी की उन्हीं चिंता थी और सुदक्षिणा को निःसंतान होने का दुःख। अंततः दोनों ने मंत्रणा की और समुचित समाधान के लिये गुरु वशिष्ठ की शरण जाने की निश्चय कर लिया।

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    गायत्री उपासना द्वारा दुःख निवारण

    गायत्री उपासना द्वारा दुःख निवारण

    मनुष्य ईश्वर का उत्तराधिकारी एवं राजकुमार है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है। अपने पिता के सम्पूर्ण गुण और वैभव बीज रूप उसमें मौजूद है। जलते हुए अंगार में जो शक्ति है वही छोटी चिनगारी में भी मौजूद है। इतना होते हुए भी हम देखते हैं कि मनुष्य बड़ी निम्न कोटि का जीवन बिता रहा है। दिव्य होते हुए भी दैवी सम्पदाओं से वंचित हो रहा है।

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    धर्म में ही कल्याण हैं

    धर्म में ही कल्याण हैं

    जीवन एक पाठशाला है, जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा प्राप्त करते हैं। विश्व में आज तक जो भी व्यक्ति आया है, उसने अपनी यात्रा के दिन पूरे करते हुए यही कहा है कि संसार में एक ही वस्तु ग्रहण करने योग्य है और वह है- ‘धर्मज्ञ’ इस लोक की और परलोक की सारी संपदाएं धर्म की धुरी से बँधी हुई हैं।

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    एकांत में एकाग्रता

    एकांत में एकाग्रता

    दुःख एक दयालु डॉक्टर की तरह है जो एक बार फोड़े की चीर कर चिर संचित मलों की दुःखद वेदनाओं को सदा के लिए दूर कर देता है। ऐसा डॉक्टर हमारे आदर का पात्र होना चाहिए यदि दुःख आवे तो हमारे घर में उसका सुख की भाँति स्वागत होना चाहिए। दुख और सुख को समान समझने वाला ही विवेकवान कहा जाता है।

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    चेतना और चित्त के बीच का फर्क

    चेतना और चित्त के बीच का फर्क

    एकमात्र चिन्तन ही वह उपाय है जिसके द्वारा चेतना की, आत्मा की अनुभूति और प्रगति सम्भव है। विद्वज्जन उसी अक्षर, अविनाशी, अजर-अमर आत्मा का चिन्तन करते हैं। लौकिक जीवन से उतना ही सम्बन्ध रखते हैं जितना आत्मा के आध्यात्मिक विकास के लिये आवश्यक है। अन्यथा आत्मा के गुणों और कौतुक का चिन्तन ही उनका स्वभाव होता है। उसी में असीम तृप्ति भी है।

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    जीवन में विवाद को नही संवाद को जगह दो: मुनि तरुण सागर

    जीवन में विवाद को नही संवाद को जगह दो: मुनि तरुण सागर

    जीवन की समृद्धि के लिए पैसा संसार नहीं है, पैसे के प्रति आसक्ति संसार है। घर परिवार संसार नहीं है,उसके प्रति जो आसक्ति है वह संसार है। आसक्ति जो आ सकती है पर जा नहीं सकती ।बाहर से किसी चीज को छोड़ना बहुत आसान है पर भीतर से छोड़ना बहुत मुश्किल।

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    साधको को ही मिलती हैं ,सिद्धि रूपी सम्पदा

    साधको को ही मिलती हैं ,सिद्धि रूपी सम्पदा

    विजय अकेली नहीं आती वह अपने साथ अनेक सम्पत्तियाँ लाती है, जिनके वैभव से मनुष्य का मन, शरीर और घर जगमगाने लगता है। जिसने सफलता प्राप्त की, उसके गले में लक्ष्मी की वरमाला पड़ती है, संसार उसके आगे मस्तक झुका देता है। उसके दोष भी गुण बन जाते हैं। यह दुनिया सदा से ही विजयी वीरों की पूजा करती आ रही है। जिसने अपना पराक्रम प्रकट किया है, उसी की महानता स्वीकार की गई है। जिसने चमत्कार कर दिखाया उसे नमस्कार किया गया है।

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    नियति के अंतराल का सूक्ष्म प्रवेश

    नियति के अंतराल का सूक्ष्म प्रवेश

    पदार्थ जगत से हमें निर्वाह प्राप्त होता है और .... रजन भी। अतएवं उसकी उपयोगिता से .... हुए भी हमें चेतनात्मक रसास्वदन के लिए एक कदम आगे बढ़ना होगा। आनन्द की अनुभूति इन्द्रियों में नहीं चेतना के स्तर एवं उभार में है। विक्षिप्त, अविकसित एवं प्रसुप्त मूर्छित व्यक्ति इन्द्रियों के समक्ष रहने पर भी रसानुभूति से वंछित ही रहता है। प्रचुर साधना सामग्री लेने में असमर्थ ही रहा है।

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    गति और परमगति का विश्लेषण

    गति और परमगति का विश्लेषण

    हम जब यह कहते हैं कि यह कमरा जिसमें हम रह रहे हैं—‘स्थिर है’ तो उसे झूठा कहने का किसी को भी अधिकार नहीं है। प्रकृति भी हमें ऐसा सोचने से विवश नहीं करती। किन्तु ऐसा हम तभी तक कह सकते हैं, जब तक कि हम इस कमरे से या यह कमरा जिस वस्तु पर (पृथ्वी पर) आधारित है, से संबंध बनाये हुए है। यदि हमें आकाश में सूर्य−चन्द्रमा, तारे नहीं दिखाई देते, केवल आकाश ही आकाश दिखाई देता तो हमें अपने कमरे के स्थिर होने में कतई सन्देह नहीं होता।

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    ''संस्कार व संस्कृति मानवीय मूल्यों के दो अहम जेवर''

    ''संस्कार व संस्कृति मानवीय मूल्यों के दो अहम जेवर''

    मुनिश्री ने बताया कि विदेशी संस्कृति से उत्पन्न दुर्भाग्य देखिए रास्ते के एक तरफ देशी शराब की दुकान है और दूसरी तरफ विदेशी शराब की दुकान है और बीच में नशा मुक्ति अभियान है यह मेरा हिंदुस्तान है। यह हमारी संस्कृति, सभ्यता नहीं है। आज हम सभी संस्कारो को भूलकर एक ही संस्कार बाकी रह गया है अंतिम संस्कार। स्त्रियों को सन्देश देते हुए कहा कि होंठो पर मीठी जुबान की जरूरत है ना कि लिपस्टिक की और मुंह पे मधुर मुस्कान जरूरी है ना की पाउडर की।

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    न हों ईश्वर से विमुख

    न हों ईश्वर से विमुख

    जिन्दगी को ठीक तरह जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, रास्ता बताये, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही सम्पन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर जिन्दगी की लम्बी मञ्जिल बड़ी हँसी−खुशी और सुविधा के साथ पूरी जाती है। अकेले चलने में यह लम्बा रास्ता भारी हो जाता है और कठिन प्रतीत होता है।

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    उमंग का पर्व है श्रावणी तीज : रमेश सर्राफ

    उमंग का पर्व है श्रावणी तीज : रमेश सर्राफ

    तीज से शुरू होने के बाद त्योहारों का सिलसिला गणगोर तक चलता है। इसीलिए राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है:-तीज त्योहारा बावड़ी,ले डूबी गणगोर।

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    यज्ञ के माध्यम से कामना सिद्धि

    यज्ञ के माध्यम से कामना सिद्धि

    कामनाएँ निन्दित नहीं है। निन्दित और त्याज्य है उनके स्वरूप और साधनों की निकृष्टता। कामनाओं की श्रेष्ठता तभी है- जब इनमें स्वयं के हित के साथ औरों का हित चिंतन जुड़ा हो। यदि इनकी पूर्ति के श्रेष्ठतम साधन की ढूँढ़ -खोज हो तो दिव्यदृष्टा ऋषिगणों की अनुभूतियों-प्रयोगशाला बने उनके जीवन की निष्कर्ष एक ही शब्द में मिल जायेगा-’यज्ञ’।

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    आत्म निर्माण के आधार

    आत्म निर्माण के आधार

    परिवर्तन एवं निर्माण का कार्य अपने आप से आरम्भ होना चाहिए। दृष्टिकोण के हेर-फेर के आधार पर ही जीवन की अन्य सब प्रक्रियाएँ बदलती हैं, इसलिए हमें अपनी आधार नीति में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए तैयार होना चाहिए। प्रारम्भिक बात यह है कि हमारा समय, श्रम धन और मस्तिष्क जितना शारीरिक उद्देश्यों की पूर्ति में भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में लगता है उतना ही आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लगाने को तत्पर होना चाहिए। उतना न बन पड़े तो उससे आधा तो लगना ही लगना चाहिए।

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    क्या हैं साकार और निराकार साधना...

    क्या हैं साकार और निराकार साधना...

    भगवत् उपासना में जो कुछ करना होता है अपने लिए ही करना होता है। भगवान को न किसी वस्तु की आवश्यकता है और न उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ देने का उपक्रम बन सकता है। तो भी नियत समय पर नियत उपासना का उपक्रम करते रहने की आवश्यकता होती है। ताकि मन को उसका अभ्यास बन पड़े और धीरे-धीरे वह परिपक्व होता चले, साँचे में ढलता चले।

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    'भाग्य और कुछ नहीं बल्कि हमारे कर्मों का ही परिणाम'

    'भाग्य और कुछ नहीं बल्कि हमारे कर्मों का ही परिणाम'

    कथा मर्मज्ञ रामदेवरा के संत स्वामी मूल योगीराज ने कहा कि भाग्य ओर कुछ नहीं बल्कि हमारे कर्मों का ही परिणाम है। हर कार्य के पीछे कारण छुपा हुआ होता है। बिना कारण के कुछ भी घटित नहीं होता। इसी तरह जिन विशेष परिस्थितियों को भाग्य कह दिया जाता है, उनका कारण हमारे पहले के कर्म ही होते हैं।

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    ईश्वर प्राप्ति का सरल मार्ग

    ईश्वर प्राप्ति का सरल मार्ग

    सरयू तट पर विराजमान स्वामी ओमानंद जी के समीप किसी गाँव का रामलाल नामक एक व्यक्ति आया। उसने स्वामी जी से करबद्ध प्रार्थना करते हुए कहा कि मुझे भी कुछ उपदेश दीजिये कि ईश्वर के दर्शन पा सकूँ स्वामी जी ने रामलाल से कहा- “ओ रामलाल! कृष्ण भगवान का ध्यान इस प्रकार करो कि भगवान कृष्ण पालथी मारे बाँसुरी हाथ में लिये हुये तुम्हारे हृदय कमल में बैठे हुए हैं, यह ध्यान करते हुये “ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय” मन्त्र का मन में जप करो।”

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    साधना के नियम

    साधना के नियम

    गायत्री अभिनन्दन के लिए चार बातें भली प्रकार समझ लेने की है। क्यों कि इन नियमों के बिना किया हुआ साधन समुचित फल उत्पन्न नहीं करता। कोई कार्य कितना ही उत्तम, लाभ दायक और सुलभ क्यों न हो पर उसे यथा नियम करने से ही सफलता होती है। भोजन करना, जल पीना, स्नान, चलना फिरना, लेटना, बैठना, साँस लेना, पलक मारना, मल मूत्र त्यागना जैसे साधारण दैनिक कार्यों को भी यदि उनके नियत विधि विधान के साथ न दिया जाए तो उस अव्यवस्था के कारण भयंकर परिणाम उपस्थित हो सकते है।

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    धार्मिक रीतियों की विविधता को दर्शाता है हरेला पर्व

    धार्मिक रीतियों की विविधता को दर्शाता है हरेला पर्व

    उत्तर प्रदेश का कभी हिस्सा रहा देव भूमि कहा जाने वाला उत्तराखण्ड भले ही आज अलग राज्य हो, लेकिन दोनों प्रदेशों की संस्कृति, तीज-त्योहारों और यहां रहने वाले लोगों ने आज भी एक-दूसरे को बेहद अटूट रिश्ते से जोड़ रखा है।

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    अमृत कण

    अमृत कण

    आनन्द का वास्तविक स्वामी तो कर्त्तव्य पालन और त्याग ही है। यदि हम परमार्थ के लिए कुछ करते हैं अथवा किसी के लिए स्वयं हंसते-हंसते कष्ट झेलते हैं अथवा किसी दीन भिखारी को कुछ दे डालते हैं, तो हमारी आत्मा में कैसा मधुर, सुखकर, शान्त नाद सा होता है कितना आनन्द आता है तब।

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    अभेद्य हैं हमारा ह्रदय

    अभेद्य हैं हमारा ह्रदय

    बड़े-बड़े राजा नरेश अपने रहने के लिए किले बनवाते हैं। उनकी मजबूती पर पूरा ध्यान देते हैं ताकि कोई शत्रु उन पर हमला न कर सके और करे तो उस मजबूत किले की दीवारें उसे राजा तक न पहुँचने दें। जिसका किला जितना ही मजबूत होता है, वह अपने को उतना ही अजेय समझता है। अपनी रक्षा के निमित्त अन्य प्राणी भी निवास गृह बनाते हैं।

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    क्या सन्देश देते हैं हमारे वेद

    क्या सन्देश देते हैं हमारे वेद

    उठो, बढ़ो और विजय प्राप्त करो, तुम्हारी भुजाएं उग्र हों जिससे तुम कभी हार न सको।

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    विपत्ति का कारक है तमोगुण

    विपत्ति का कारक है तमोगुण

    जिस साधक में तमोगुण की प्रधानता रहती है उसे दो प्रकार कि विपत्ति में फँसने की सम्भावना रहती है। सबसे पहले साधक के हृदय में उठता है कि-मैं दुर्बल, पापी, घृणित, अज्ञानी, अकर्मण्य हूँ। जिस किसी को मैं देखता हूँ सभी मुझसे ऊँचे दिखाई देते हैं। मैं सबसे नीच हूँ, भगवान को हमारी आवश्यकता नहीं। भगवान मुझे अपनी शरण में लेकर क्या करेंगे? मानों ईश्वर की शक्ति परिमित है और अवस्था विशेष के ऊपर निर्भर करती है और वह उक्ति मिथ्या है कि वह गूँगे को बोलने की शक्ति प्रदान कर सकता है और लूले को चलने की शक्ति दे सकता है।

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    धर्म : सामाजिक प्रगति का आधार

    धर्म : सामाजिक प्रगति का आधार

    स्वार्थ परता की मात्रा जब मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगती है तब मनुष्य किसी भी मार्ग से अपनी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए तत्पर हो जाता है। उचित अनुचित का विचार छोड़कर जैसे भी बने वैसे अपना स्वार्थ सिद्ध करने की नीति जब अपनाई जाने लगती है तो मनुष्य का व्यक्तित्व असुरता से परिपूर्ण हो जाता है। असुरता की जहाँ वृद्धि होगी वहाँ सुख−शान्ति का ठहर सकना संभव न होगा।

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    स्वामी विवेकानंद : आत्मज्ञान की सीढियाँ

    स्वामी विवेकानंद : आत्मज्ञान की सीढियाँ

    स्वामी विवेकानन्द ने आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए 7 सीढ़ियाँ बतलायी हैं

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    सेवा ही सच्ची भक्ति

    सेवा ही सच्ची भक्ति

    भगवान की भक्ति के नाम पर लोग ऐसी विडम्बनाएँ रचते रहते हैं, जिसमें पूजा पाठ जैसी कुछ खिलवाड़ तो होती रहे, पर बदले में ऋद्धि सिद्धियाँ, चमत्कारों और वरदानों का जखीरा लूट के माल की तरह हाथ लगे। कई स्वर्ग और मुक्ति का वैभव स्वर्ग लोक में पहुँच कर बटोरना चाहते हैं। कइयों को दर्शन की इच्छा होती है मानो किसी रूपसी की समीपता का रसास्वादन करना चाहते हों। दस पैसे की मिठाई मनौती के लिए चढ़ाकर मालामाल बनने और मुफ्त में बढ़ चढ़कर सफलताएँ प्राप्त करने की ख्वाइश तो इस समुदाय के अधिकाँश लोगों को होती है।

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    नाद ब्रह्म साधना का रहस्य

    नाद ब्रह्म साधना का रहस्य

    प्रकृति की प्रमुख शक्तियों में ताप, प्रकाश एवं विद्युत की भाँति ही ‘शब्द’ की भी गणना होती है। अध्यात्म शास्त्रों में शब्द को ब्रह्म तक कहा गया है, जबकि पदार्थ विज्ञानी शब्द को भौतिक तरंगों का स्पन्दन भर मानते हैं। उनका कहना है कि शब्द अर्थात् ध्वनि टकराव से उत्पन्न होती है और ईथर तथा वायु के सहारे अपना परिचय देती है। सामान्यतया उसे किसी घटना की जानकारी देने वाली समझा जाता है और सर्वाधिक उपयोग शब्द गुच्छकों के माध्यम से वार्तालाप में किया जाता है। परन्तु इसे इतने छोटे क्षेत्र तक ही सीमित नहीं मान लेना चाहिए।

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    करुणा की शक्ति

    करुणा की शक्ति

    करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। करुणा और प्रेम से आप्लावित हृदय वाले शूरो के लिए परिस्थितियाँ या सामर्थ्य हीनता सेवा-साधना में बाधक नहीं बन सकती

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    अहंकार त्याग देने से मुक्त होती है अंतरात्मा

    अहंकार त्याग देने से मुक्त होती है अंतरात्मा

    शाहजहाँ अपने समय का सुविख्यात प्रतिभावान व्यक्ति था। उसका पराक्रम, कौशल और व्यक्तित्व तीनों ही बढ़े−चढ़े थे। उसने अपना राज्य बढ़ाया और कई तरह की सफलताएँ पाइ। पर यहाँ चूक गया कि उपार्जित संपदाओं एवं सफलताओं का उपभोग कहाँ किया जाय। उसने अपने बैठने के लिए तख्त–ताऊस बनाया और अपनी बीबी की कब्र के रूप में ताजमहल खड़ा किया। यह दोनों ही रचनाएँ अद्भुत थीं।

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    जोधपुर में 21 वर्षों बाद संतों का चातुर्मासिक समागम

    जोधपुर में 21 वर्षों बाद संतों का चातुर्मासिक समागम

    भंडारी ने बताया कि इनके साथ ही मरूधरा सिंहनी महाश्रमणी तेजकंवर म.सा. की सुशिष्या उमरावकंवर म.सा. प्रीतिसुधा म.सा. एवं मधुसुधा म.सा. आदि ठाणा 3 का चातुर्मास महावीर भवन निमाज की हवेली में होना सुनिश्चित हुआ है।

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    परलोक जीवन और सात नर्क

    परलोक जीवन और सात नर्क

    मृत्यु के अवसर पर मनुष्य के स्थूल शरीर में से उसका छाया शरीर (ईश्वरमय शरीर) बाहर निकल जाता है। मनुष्य का प्राण और अन्य तत्व भी इसी छाया शरीर के साथ रहते हैं। इससे मनुष्य की देह और ज्ञानेन्द्रियाँ शून्य हो जाती हैं। स्थूल इन्द्रियाँ तो ज्यों की त्यों दिखाई पड़ती है, पर चूँकि उनका स्वामी चला गया, इसलिये वे कोई काम नहीं कर सकती। जो उनके द्वारा देखता था, सुनता था, स्वाद लेता था, या छूता था, वह निकल गया।

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    अस्थिर मन की दुश्वारियां

    अस्थिर मन की दुश्वारियां

    भगवान ने मनुष्य के शरीर को इस योग्य बनाया है कि यदि उसका व्यतिक्रम न किया जाय तो वह निस्संदेह दीर्घजीवी हो सकता है और जब तक आयुष्य पूरा न हो हँसी−खुशी के साथ निरोग जीवन व्यतीत कर सकता है। प्राचीनकाल में यहाँ सभी दीर्घजीवी होते थे। अब भी जिनके शरीर और मन पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ा है वे दीर्घ जीवन का सुखोपभोग करते हैं।

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    भ्रष्ट न हो दर्शन

    भ्रष्ट न हो दर्शन

    संचित तत्व दर्शन इतना निरर्थक नहीं है कि उसे कूड़े−करकट के ढेर में फेंक कर कीड़े−मकोड़ों के आचरण को प्रकृति प्रेरणा मानकर उसके अनुकरण की बात सोचनी पड़े। कुत्ता दूसरे कुत्ते के मुँह का ग्रास छीनने की कोशिश करता है। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है तो हमें भी अपने पुरातन तत्व दर्शन को ठुकराकर इन्हीं हेय कृत्यों को प्रकृति का निर्देश मानने और उनका अनुकरण करने के लिए तत्पर होना चाहिए यह आवश्यक नहीं।

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    मन विकास के सोपान

    मन विकास के सोपान

    वस्तुतः मनुष्य किसी बाह्य शक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं है। अपितु वह स्वयं चिन्तन चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता अथवा निकृष्टता का चयन कर स्वयं को उठाता अथवा गिराता है। इसी को महर्षि पाताँजलि चित की विभिन्न भूमियाँ कहते हैं एवं इन्हें क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्रता, निरुद्ध के नाम से पुकारते हैं।

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    मनुष्य को शास्त्ररुपी दर्पण में अपने चेहरे को अवश्य देखना चाहिए : स्वामी अभयानंद

    मनुष्य को शास्त्ररुपी दर्पण में अपने चेहरे को अवश्य देखना चाहिए : स्वामी अभयानंद

    मनुष्य विपरीत अवस्था में भयभीत नही होना चाहिए महाराज जी ने बताया कि भले ही परमात्मा आपके पुत्र के रुप आ जाय लेकिन कर्मो का फल (प्रारब्ध) अवश्य भोगना पड़ेगा। कर्मो की चर्चा करते हुए महाराज जी ने बताया कि हमकों मनुष्य का शरीर तभी प्राप्त होता है जब हमारे जीवन में पाप और पुष्य दोनों प्रकार के कर्म होते है

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    आत्म-साधना में सात्विक आहार का महत्व

    आत्म-साधना में सात्विक आहार का महत्व

    आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रगति पथ पर पहला चरण बढ़ाने वाले को अपने आहार को सुधारने और उसकी मात्रा में कटौती करनी चाहिए। किसके लिए आहार की कितनी मात्रा पर्याप्त है? इसका निर्णय उसी को स्वयं करना होगा। क्योंकि हर व्यक्ति की स्थिति भिन्न होती है। उसके पाचन तन्त्र की क्षमता कितनी है? इसकी जानकारी जितनी अच्छी तरह अपने आप को होती है, उतनी दूसरे को नहीं। इसलिए निर्धारण भी स्वयं ही किया जाना चाहिए।

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    परमात्मा से मिलाती है प्रेम-साधना

    परमात्मा से मिलाती है प्रेम-साधना

    परिश्रम के पश्चात विश्राम, क्षुधा के पश्चात भोजन और कष्ट के पश्चात सुख का आनन्द मिलता है- इसी प्रकार मिलन का आनन्द विछोह के बाद ही मिलता है। दो स्नेही जन एक स्थान पर रह कर जब नित्य मिलते हैं तो नवीनता समाप्त हो जाने पर मिलन का आनन्द शिथिल हो जाता है। किन्तु जब वे दोनों सुहृद कुछ समय अलग रहने के बाद मिलते हैं तो मिलन का आनन्द सहस्त्रों गुना हो जाता है।

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    जीवन में दुःख व कष्ट मिलना प्रभु की असीम कृपा है!

    जीवन में दुःख व कष्ट मिलना प्रभु की असीम कृपा है!

    प्रभु जब किसी को अपना मानते हैं, उसे गहराइयों से प्यार करते हैं तो उसे अपना सबसे भरोसेमंद सेवक प्रदान करते हैं और उसे कहते हैं कि तुम हमेशा मेरे प्रिय के साथ रहो, उसका दामन कभी न छोड़ो।

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    एकाग्रता का सामर्थ्य

    एकाग्रता का सामर्थ्य

    एकाग्रता एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियन्त्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित किया गया होता, तो गहराई में उतरने और महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता। यह चित्त की चंचलता ही है, जो मन: संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट- भ्रष्ट करती रहती है।

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    भए प्रगट कृपाला दीन दयाला

    भए प्रगट कृपाला दीन दयाला

    रामनवमी के मौके पर शहर के आर्यनगर स्थित भगवान राम-सीता मंदिर पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सुबह से लेकर शाम तक भगवान के दर्शन करने के लिए लोगों की भीड़ लगी रही। मंदिर के पुजारी आशीष शास्त्री के सानिध्य में सिटी मजिस्ट्रेट जेपी गुप्ता ने भगवान राम की पूजा-अर्चना कर आरती की। इसके बाद रात को भजन संध्या कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमंे बरेली, शाहजहांपुर तथा लखनऊ के गायकों ने एक से बढ़कर एक भजन सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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    मोरारी बापू के साथ सीएम ने भी लगाए शौर्य स्मारक पर पौधे

    मोरारी बापू के साथ सीएम ने भी लगाए शौर्य स्मारक पर पौधे

    लाल परेड मैदान स्थित मोतीलाल नेहरू स्टेडियम पर राम कथा सुना रहे संत मोरारी बापू ने कथा के तीसरे दिन उपस्थित श्रोताओं को दो संकल्प दिलाए थे। इनमें से एक यह संकल्प तो नशा छोड़ने का था और दूसरा संकल्प यह था कि सभी लोग शहर के पर्यावरण की सुरक्षा के लिए रामनवमीं पर एक पौधा अवश्य लगाएं।

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    मर्यादा का सन्देश देती है राम कथा

    मर्यादा का सन्देश देती है राम कथा

    प्रभु श्री राम का जीवन मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप मे जाना जाता है तथा श्री राम कथा सभी को मर्यादाओ का पालन करने एंव तदानुसार जीवन यापन का संदेश है । यह बात स्थानीय मोहल्ला भूलनपुर स्थित 200 वर्षीय प्राचीन माता गौरी देवी मंदिर मे प्रारम्भ हुई श्री राम कथा के प्रथम दिन अयोध्या धाम के व्यास संत शालिक राम महराज ने कही।

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    अधिक मोह ही है विपत्तियों का कारण

    अधिक मोह ही है विपत्तियों का कारण

    संसार मे किसी से भी अधिक मोह रखना ही विपत्तियो का कारण है। इस मोह के कारण लोग मरना नही चाहते। संसार मे न कुछ दुख है नही सुख है। यह केवल मनका मानना है।

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    बासंतिक चैत्र नवरात्र की तैयारियां हुईं पूरी

    बासंतिक चैत्र नवरात्र की तैयारियां हुईं पूरी

    काशी पुराधिपति बाबा विश्वनाथ की नगरी आदि शक्ति के पूजन अर्चन के लिए तैयार है। मंगलवार की शाम से शुरू हो रहे बासंतिक चैत्र नवरात्र पर तड़के बुधवार से भगवती के गौरी स्वरूप की आराधना शुरू हो जायेगी।

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    शुभ संयोग लेकर आ रहे चैत्र नवरात्र, रामनवमी पर बनेगा पुष्य नक्षत्र

    शुभ संयोग लेकर आ रहे चैत्र नवरात्र, रामनवमी पर बनेगा पुष्य नक्षत्र

    मध्यप्रदेश में हिन्दू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि की तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। इस बार जहां नववर्ष मिला-जुला असर देने वाला रहेगा, वहीं चैत्र नवरात्र खास संयोग लेकर आ रहे हैं। नवरात्र के पांच दिन खास रहेंगे, क्योंकि दिन शुभ संयोग बन रहा है, जबकि 5 अप्रैल को पडऩे वाली रामनवमी पुष्य नक्षत्र में होने के कारण लाभ देने वाली रहेगी।

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    भगवान स्वयं करते हैं भक्तों की रक्षा

    भगवान स्वयं करते हैं भक्तों की रक्षा

    भक्तो के रक्षक मेरे गोविन्द जंहाँ नित्य वास करे उसे वृन्दावन कहते हैं। वृन्दावन जैसा कोई धाम नहीं और नैमिषारण्य जैसा कोई तीर्थ नहीं। आज भी यहां के कण कण में अठ्ठासी हजार ऋषियों का वास है। यहां तो प्रभु की कृपा बेमोल बंट रही है जितना चाहे सहेज लो यह बात तीर्थ नैमिषारण्य स्थित स्वामी नारदानन्द आश्रम मे तपोभूमि शुकदेवटीला पर आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के छठे दिन कथा व्यास आचार्य धनंजय पाण्डेय ने कही। व्यास जी कहते हैं कि काम क्रोध और लोभ ये तीनों नरक के द्वार हैं अतः इन तीनों का त्याग करना चाहिये क्रोध जितना दूसरों को कष्ट पहुंचाता है उससे अधिक अपने को हानि कराता है, क्रोध का आवेग आने पर भगवान के नाम का स्मरण करना चाहिये क्रोध शांति का ये सबसे सहज उपाय है।

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    भक्त की पुकार सुन भगवान् अवश्य आते हैं

    भक्त की पुकार सुन भगवान् अवश्य आते हैं

    जब हम अपने मन को प्रभु के भजन में समर्पित कर मंदिर बनाते हैं तो हमारे अंतःकरण में भगवान स्वयं विराजते हैं फिर हमारा नटखट कान्हा तो बृज का दुलारा है हमारे गोविन्द और बृज में कुछ ऐसा रिश्ता है कि बृज के रोम रोम में श्री कृष्ण है और श्रीकृष्ण के रोम रोम रोम में बृज धाम समाया हुआ है धन्य है वो धरा जहां गोविन्द ने आनन्ददायी लीलाएं की और अपने भक्तों को भी प्रेमभाव में थिरकने पर विवश कर दिया। यह बात स्वामी नारदानन्द आश्रम स्थित तपोभूमि शुकदेव टीला पर चल रहे श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह के अन्तर्गत कथा सुनाते हुये कथा व्यास आचार्य धनंजय पाण्डेय ने कही।

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    ईश्वर को पाने का साधन केवल सत्कर्म : पं. हरी शंकर

    ईश्वर को पाने का साधन केवल सत्कर्म : पं. हरी शंकर

    सिधौली (सीतापुर)। ईश्वर को पाने का साधन केवल सत्कर्म है। भगवान उसी को प्राप्त होते जो धर्म की राह पर चलकर सत्कर्म करे और बुराइयों पर विजय प्राप्त करे। यह बात क्षेत्र के ग्राम हीरपुर में आयोजित श्रीमदभागवत कथा में बनारस से पधारे कथा व्यास पण्डित हरी शंकर पाण्डे शास्त्री ने कही। भागवत कथा के छठे दिन पंडाल में महापुराण कथा का श्रवण कर रहे भक्तों से कहा कि सन्त का आदर माता पिता व् गुरु की पूजा अतिथियों का सम्मान, गाय की पूजा और प्रतिदिन भगवान का स्मरण आपको व्यक्ति को दुर्गुणों से दूर रखता है। आयोजक कृष्ण कुमार मिश्र व् मुरलीकान्त मिश्र ने बताया कि उक्त भागवत कथा का आयोजन अयोध्या के गुरु राम मंगल दास व् माता पिता की स्म्रति में गत 28 फरवरी से चल रहा है। 7 मार्च को भंडारे के साथ समापन होगा। इस अवसर पर सुशील कुमार, राम सागर, राम, कैलाश, हरीश, अनिल कुमार, दिलीप मिश्र, प्रमोद, सुनील व् क्षेत्रवासी उपस्थित थे।

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    परमात्मा के ज्ञान में ही सारा ज्ञान समाहित है!

    परमात्मा के ज्ञान में ही सारा ज्ञान समाहित है!

    यह पृथ्वी करोड़ों वर्ष पुरानी है। इस पृथ्वी का जीवन करोड़ों वर्ष का है क्योंकि जब से सूरज का जीवन है तब से मनुष्य का जीवन है। भारत की सभ्यता सबसे पुरानी है। आज मनुष्य का जीवन बहुत ही सुनियोजित एवं वैज्ञानिक ढंग से चल रहा है। यहाँ पर जो प्रथम मानव उत्पन्न हुआ वो बिठूर में गंगा जी के घाट के पास उत्पन्न हुआ।

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    आध्यात्मिक संतुष्टि की अनुभूति शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती!

    आध्यात्मिक संतुष्टि की अनुभूति शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती!

    परमात्मा को समर्पित करके, एकाग्रचित्त होकर तथा पवित्र हृदय से अपनी नौकरी या व्यवसाय करने से निरन्तर गजब की आध्यात्मिक संतुष्टि की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक संतुष्टि का स्वाद तो ‘‘गूँगे व्यक्ति का गुड़’’ खाने के समान है। गूँगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद को तो महसूस कर सकता है लेकिन उसे अपनी वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं कर सकता।

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    मुक्ति एवं उसके साधनों की दुर्लभता

    मुक्ति एवं उसके साधनों की दुर्लभता

    प्राणियों के लिए सर्वप्रथम तो मनुष्य देह प्राप्त करना ही अत्यंत दुर्लभ है : उसमे भी परुष शरीर , उसमे भी ब्राह्मणत्व के संस्कार , उसमे भी वैदिक धर्म में प्रवृति , उसमे भी शास्त्र के आत्म-अनात्म विचार रूपी तातपर्य का सम्यक ज्ञान,उसमे भी प्रत्यक्ष अनुभूति,उसमे भी ब्रह्म निरन्तर स्थिति -- ये उत्तरोत्तर दुर्लभ हैं। इसप्रकार सैंकड़ों करोड़ जन्मों सत्कर्म रूपी पुण्यों बिना मुक्ति मिलती।

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    भव सागर से पार होने मे शिव आराधना ही सर्वोत्तम उपाय

    भव सागर से पार होने मे शिव आराधना ही सर्वोत्तम उपाय

    मनुष्य को यदि संसार सागर से पार होना है तो शिवजी की आराधना आवश्यक है| शिवजी का स्वरुप ही कल्याणकारी है| जिसने जीवन भर भजन नहीं किया यदि वह भी शिव जी का भजन एक बार कर ले तो उसे भी गति मुक्त मिल जाती है ।उक्त बातें वाराणसी से पधारे मानस मराल गणेश जी महाराज ने सुल्तानगढ़ स्थित तमसा तट पर हनुमान मंदिर पर आयोजित रूद्र महायज्ञ एवं शिव पुराण कथा प्रसंग में कही। उन्होंने कहा कि भजन ना करने वाले की अस्थि भी यदि काशी में पहुंच जाए तो उसका मोक्ष हो जाता है | भक्ति में अभिमान का कोई स्थान नहीं है |ब्रह्मा जी की पुत्रियों को भी अपने सुंदरता पर अभिमान हुआ तो उन्होंने सनकादिक ऋषियों का अपमान किया |परिणाम स्वरुप उन्हें श्राप प्राप्त हुआ

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    शिवत्व की प्राप्ति ही सांसारिक माया से दिला सकती है मुक्ति : साध्वी प्रीति

    शिवत्व की प्राप्ति ही सांसारिक माया से दिला सकती है मुक्ति : साध्वी प्रीति

    भगवान शंकर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने से पूर्व बैल की सवारी किये । शास्त्रो में बैल को धर्म का स्वरूप माना गया है | ये विचार कथावाचिका सुश्री प्रीति उपाध्याय ने हयातगंज पुलिस चौकी चौक टाण्डा पर चल रही राम कथा दूसरे दिन व्यक्त किये । भगवान शंकर की तरह सभी गृहस्थ को धर्म के पीछे चलना चाहिए | जिससे पाप से बचा जा सके । उन्होने कहाकि भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती कीतरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था

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    पाप पुण्य जीवन मरण विधाता के हैं प्रपंच – साध्वी सरस्वती

    पाप पुण्य जीवन मरण विधाता के हैं प्रपंच – साध्वी सरस्वती

    जलालपुर- अम्बेडकरनगर| राम नाम ही संसार का सार है वहीं नीति में निपुण है वहीं विद्वान है | जिसका मन एक मात्र राम के चरणों में अनुरक्त है वही भक्ति सार्थक है | जो राम के प्रति है स्वर्ग की कामना ही मोह का मूल है, परमात्मा का चिंतन ही परमार्थ है, भक्ति में स्वार्थ वा लालच बाधक है | उक्त बातें रीवा मध्य प्रदेश से पधारी साध्वी सरस्वती जी ने ब्रह्म धाम मधुपुर में आयोजित रामकथा के प्रथम दिन कही | उन्होंने कहा कि विधाता का प्रपंच गुण और अवगुणों से सना है | पाप पुण्य जीवन मरण आदि ही विधाता का प्रपंच है ,जिस माया के वशीभूत जीव नाचता है | वही परमात्मा की दासी है | मायाराम के कृपा के बिना नहीं छूट सकती काल सबके ऊपर मडरा रहा है

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    महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

    महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

    कृष्णपक्ष में हरेक चन्द्रमास का चौदहवां दिन या अमावस्या से एक दिन पूर्व शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक पंचांग वर्ष में होने वाली सभी बारह शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि जो फरवरी-मार्च के महीने में पड़ती है सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इस रात्रि में इस ग्रह के उत्तरी गोलार्थ की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है। यह एक ऐसा दिन होता है जब प्रकृति व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक शिखर की ओर ढकेल रही होती है । इसका उपयोग करने के लिए इस परंपरा में हमने एक खास त्योहार बनाया है जो पूरी रात मनाया जाता है। पूरी रात मनाए जाने वाले इस त्योहार का मूल मकसद यह निश्चित करना है कि ऊर्जाओं का यह प्राकृतिक चढ़ाव या उमाड़ अपना रास्ता पा सके ।

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    चंद्र ग्रहण 2017 का ज्योतिषीय महत्व

    चंद्र ग्रहण 2017 का ज्योतिषीय महत्व

    मानव मात्र ऐसा प्राणी है, जो धरा सहित आकाशीय घटनाओं के बारे में अनूठी जानकारी हासिल करके आज उनके प्रभाव से भली प्रकार न केवल परिचित है, बल्कि इस तथ्य को भली प्रकार से जानता भी है, कि सूर्यादि नवग्रहों का प्रभाव धरती पर रहने वाले प्रत्येक प्राणियों पर पड़ता है। चंद्र जहाँ पृथ्वी के आश्रित रहने वाले विभिन्न प्रकार के प्राणियों चाहे वह किसी योनि व जाति के हो उन्हें प्रभावति करता है। वहीं विविध प्रकार के पेड़ पौधो को भी दिवा रात्रि में पोषित करता रहता है। चंद्र के प्रभाव को भला धरती में कैसे अनदेखा किया जा सकता है। चंद्र जहाँ सुन्दरता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। वही किसी मनुष्य के रूप लावण्य को संजाने के लिए बड़ी ही सूक्ष्मता से कार्य करता है। चंद्र इस धरती पर कवि की कविताओं का न केवल विषय है, बल्कि उनके मन की उत्सुकता व सकारात्मक को भी पुष्ट करता है। जिससे कि कवि व लेखकों की लेखनी चंद्र की सौंदर्यता को उकेरने लगती है। यदि किसी की सुन्दरता को बताना हो, तो लोग चंद्रमुखी का संबोधन किसी नायक व नायिका के लिए अक्सर करते हुए देखें जाते हैं। इसी प्रकार कई ऐसे खुशबू युक्त सुन्दर पुष्प हैं, जिनके विषय मे कहा जाता है कि जब चंद्रमा रात्रि को अपनी किरणों द्वारा उन्हें पोषित करता हैं, तभी वह खिलतें हैं। इसी प्रकार धरती पर मानव मन को भी चंद्रमा अपनी प्रभावशाली किरणों के द्वारा प्रभावित करता है। इन सब प्रभावों को देखते हुए चंद्रमा के संदर्भ में कई ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। संक्षेप में यह कहना है कि चंद्रमा पर जब ग्रहण होता है तो उसका शुभाशुभ प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर अवश्व ही पड़ता हैं। चाहे वह कोई भी व्यक्ति क्यों न हो। चंद्र ग्रहण एक परिचय

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    पाप मुक्ति और मोक्ष देगा जया एकादशी व्रत

    पाप मुक्ति और मोक्ष देगा जया एकादशी व्रत

    जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है। जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिए। जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं।

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    बसंत पंचमी 2017 पूजन और विशेषता

    बसंत पंचमी 2017 पूजन और विशेषता

    माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी माना जाता है। विद्या, बुद्धि व ज्ञान की देवी सरस्वती का आविर्भाव इसी दिन हुआ था। इसलिए यह तिथि वागीश्वरी जयंती व श्री पंचमी के नाम से भी प्रसिद्ध है। ऋग्वेद के 10/125 सूक्त में सरस्वती देवी के असीम प्रभाव व महिमा का वर्णन किया गया है। हिंदूओं के पौराणिक ग्रंथों में भी इस दिन को बहुत ही शुभ माना गया है व हर नए काम की शुरुआत के लिए यह बहुत ही मंगलकारी माना जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस बार बसंत पंचमी का त्यौहार 01 फरवरी को होगा।

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    सूर्यभेदन प्राणायाम से जागृत करें आध्यात्मिक शक्ति

    सूर्यभेदन प्राणायाम से जागृत करें आध्यात्मिक शक्ति

    प्राण शक्ति के अभिवर्धन में कुंडलिनी जागरण में सूर्यभेधन जैसे प्राणायामों की भी आवश्यकता होती है| आध्यात्मिक प्राणायाम वे हैं जिनमें ब्रह्मांडीय चेतना को जीव चेतना में सम्मिश्रित करके जीव सत्ता का अंत:तेजस जागृत किया जाता है| कुंडलिनी साधना में इसी स्तर के प्राणयोग की आवश्यकता रहती है|

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    ध्यान को दिनचर्या में सम्मलित करने के हैं अद्भुत फायदे

    ध्यान को दिनचर्या में सम्मलित करने के हैं अद्भुत फायदे

    ध्यान के लाभों को महसूस करने के लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है| प्रतिदिन यह कुछ ही समय लेता है| प्रतिदिन की दिनचर्या में एक बार आत्मसात कर लेने पर ध्यान दिन का सर्वश्रेष्ठ अंश बन जाता है| ध्यान एक बीज की तरह है| जब आप बीज को प्यार से विकसित करते हैं तो वह उतना ही खिलता जाता है| प्रतिदिन, सभी क्षेत्रों के व्यस्त व्यक्ति आभार पूर्वक अपने कार्यों को रोकते हैं और ध्यान के ताज़गी भरे क्षणों का आनंद लेते हैं| अपनी अनंत गहराइयों में जाएँ और जीवन को समृद्ध बनाएं|

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    ध्यान को दिनचर्या में सम्मलित करने के हैं अद्भुत फायदे

    ध्यान को दिनचर्या में सम्मलित करने के हैं अद्भुत फायदे

    ध्यान के लाभों को महसूस करने के लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है| प्रतिदिन यह कुछ ही समय लेता है| प्रतिदिन की दिनचर्या में एक बार आत्मसात कर लेने पर ध्यान दिन का सर्वश्रेष्ठ अंश बन जाता है| ध्यान एक बीज की तरह है| जब आप बीज को प्यार से विकसित करते हैं तो वह उतना ही खिलता जाता है| प्रतिदिन, सभी क्षेत्रों के व्यस्त व्यक्ति आभार पूर्वक अपने कार्यों को रोकते हैं और ध्यान के ताज़गी भरे क्षणों का आनंद लेते हैं| अपनी अनंत गहराइयों में जाएँ और जीवन को समृद्ध बनाएं|

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    कैसे पाएं बुरी आदतों पर विजय

    कैसे पाएं बुरी आदतों पर विजय

    नए साल की शुरुवात के साथ ही मन में यह उद्वेग होता है की हमें इस साल बुरी आदतों पर विजय पानी है| परंतु क्या ''बुरी'' आदतें ही नुकसानदायक हैं?.....असल में आदत स्वयं में ही एक बुरी चीज़ है| आदत से पर्याय है कुछ भी जो हम अचेतन मन से ऑटोमैटिकली करते हैं|

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    प्रेम है जीवन का मूल आधार

    प्रेम है जीवन का मूल आधार

    प्यार या प्रेम एक अहसास है। प्यार अनेक भावनाओं का, रवैयों का मिश्रण है, जो पारस्परिक स्नेह से लेकर खुशी की ओर विस्तारित है। यह एक मजबूत आकर्षण और निजी जुड़ाव की भावना है।

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    अटूट है धर्म और अध्यात्म का रिश्ता

    अटूट है धर्म और अध्यात्म का रिश्ता

    हिंदू धर्म में आमतौर पर धर्म के साथ अध्यात्म का नाम जरूर लिया जाता है, क्योंकि हर आस्तिक व्यक्ति दोनों को एक ही मानता है। लेकिन, क्या वास्तव में धर्म और अध्यात्म एक ही हैं या फिर दोनों अलग-अलग हैं? क्या इनका आपस में कोई रिश्ता है या फिर बेवजह दोनों को एकसाथ जोड़ दिया गया है?

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