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तीन तलाक के ताबूत में लोकसभा की अंतिम कील

By Dainik Bhaskar Up | Publish Date: 12/29/2017 3:03:16 PM
तीन तलाक के ताबूत में लोकसभा की अंतिम कील

सियाराम पांडेय ‘शांत’
 
तीन तलाक विरोधी बिल लोकसभा में पास हो गया और इसी के साथ इस देश ने तीन तलाक के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी। लोकसभा में असदुद्दीन ओवैसी के तीन संशोधन प्रस्ताव वोटिंग के दौरान संसद में खारिज हो गए। इसे मुस्लिम महिलाओं की सबसे बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। मुस्लिम महिलाओं ने तहेदिल से इस बिल का इस्तकबाल किया है।
 
 
नारी न हिंदू है और न मुसलमान। न सिख है, न जैन और न ही ईसाई। वह धर्म की धुरी है। धर्म का कंगूरा उसी धुरी पर टिका है। इस धुरी का कमजोर होना धर्म का कमजोर होना है। धर्म कमजोर हो तो विचार दृष्टि कमजोर हो जाती है और विचार दृष्टि के कमजोर होने पर व्यक्ति कमजोर हो जाता है। व्यक्ति के कमजोर होने से समाज, समाज की कमजोरी से प्रदेश और प्रदेशों की कमजोरी से देश कमजोर हो जाता है। वह अपनी शहजोरी मतलब ताकत खो बैठता है। 
 
 
जो लोग तीन तलाक के मुद्दे पर संसद में और संसद के बाहर नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं। तीन तलाक बिल में त्रुटि तलाश रहे हैं उन्हें सोचना होगा कि महिला होना सबसे बड़ा धर्म है। उसे जाति, धर्म में नहीं बांधा जा सकता। नारी की न अपनी जाति होती है और न ही धर्म। पिता के घर में वह पिता के जाति-धर्म से जानी जाती है और पति के घर में उसकी पहचान पति के जाति-धर्म से होती है। वह उस पानी की तरह है जो पात्र के अनुरूप आकर ग्रहण कर लेता है। पात्र रूप में वह अभिहित भी होता है। अभिव्यक्त भी होता है। नारी भी जल की ही तरह ही अपने आप में संपूर्ण है। उसे किसी जाति-धर्म की सीमा में बांधना और देखना ठीक नहीं है। भारतीय समाज में नारी को शक्ति स्वरूपा, भक्ति स्वरूपा कहा गया है। नारी का अपमान शक्ति का अपमान है। विडंबना यह है कि इतना सब जानते हुए भी महिलाओं का शोषण हो रहा है। उन्हें अपमानित करने की जुगत निकाली जा रही है। बार-बार महिलाओं को अपने को सही साबित करना पड़ता है। इस क्रम पर रोक कब लगेगी? विचार तो इस पर होना चाहिए।
 
 
तीन तलाक पाप है। असंवधानिक तो है ही, सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी के बाद भी एक ही बार में तीन तलाक देने का सिलसिला अभी थमा नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय में एक ही बार में तीन तलाक बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया था लेकिन इसके बाद भी भारत में तीन तलाक के सौ से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। पीड़िताओं ने सरकार से मदद की गुहार लगाई थी। गुहार लगाने वालों की मदद तो होनी ही चाहिए। अगर सरकार इतना भी न कर सके तो उसके होने का औचित्य क्या है?
 
 
पत्नी के लिए पति ही सर्वस्व होता है। पत्नी अपने पतिव्रत धर्म के लिए जानी जाती है। ‘एकई धर्म एक व्रत नेमा। काय, वचन, मन पति पद प्रेमा।’ इसके बाद भी पत्नी को क्षणिक आवास में दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ देना कथमपि न्यायसंगत नहीं है। महिलाओं की भावनाओं का सम्मान तो किया ही जाना चाहिए। नीति कहती है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।’ जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहीं देवता निवास करते हैं। विपक्ष को, मुस्लिम धर्मगुरुओं को पहले तो यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे तीन तलाक को सही मानते हैं या गलत? सही मानते हैं तो क्यों और गलत मानते हैं तो क्यों? क्या महिला का किसी कारणवश देर से उठना गुनाह है जो उसे तीन तलाक दे दिया जाए? 
 
 
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पहले ही इस बात को स्पष्ट कर चुकी है कि वह मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की लड़ाई खुद लड़ेगी। यही वजह है कि पहले उसने तीन तलाक पर प्रतिबंध के लिए विधेयक का मसौदा तैयार किया। उसे कैबिनेट में मंजूरी दी और अब उसे लोकसभा के पटल पर रख दिया है। आल इंडिया पर्सनल लाॅ बोर्ड देश भर के मुस्लिम सांसदों से इस बात का आग्रह कर रहा था कि वे तीन तलाक को प्रतिबंधित करने और विवाहित मुस्लिम महिलाओं के अधिकार सुरक्षित करने से संबंधित ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2017 को सदन में न रखने दें। सरकार को ऐसा करने से रोकें। कैबिनेट में बिल का मसौदा तैयार होने के दिन से ही आल इंडिया पर्सनल लाॅ बोर्ड परेशान है। वह बैठकें कर रहा है। उसने यह भी कहा है कि शाहबानो प्रकरण मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड का विषय नहीं था। भारत में तीन तलाक पर प्रतिबंध की जरूरत पहली बार इसी मुद्दे के बाद महसूस की गई थी। उसके बाद जिन महिलाओं ने इस मामले को कोर्ट में ले जाने का नैतिक साहस दिखाया, उनके पराक्रम को सराहा जाना चाहिए। कायदतन तो आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड को उसी दिन सक्रिय होना चाहिए था जब तीन तलाक देकर मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी नर्क बनाई जा रही थी। अगर बोर्ड ने हस्तक्षेप किया होता। मुस्लिम समाज को समझाने और जागरूक करने की कोशिश की होती तो कोर्ट और सरकार के स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। उसे बताना चाहिए कि वह केवल पुरुषों की संस्था है या महिलाओं के हितों के प्रति भी उसके अपने कुछ कर्तव्य हैं। महिलाएं घर-परिवार में मां, बहन, बेटी और पत्नी के रूप में देखी जाती हैं और इस रूप में उनका सम्मान बनाए रखना पूरे देश की जिम्मेदारी है। 
 
 
केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने तीन तलाक को प्रतिबंधित करने वाला विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया है। साथ ही यह भी कहा है कि यह बिल महिलाओं के सम्मान का है, इसे मजहबी चश्मे से न देखा जाए। यह कानून ऐतिहासिक है और पूरी तरह संवैधानिक है। उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘तलाक ए बिद्दत’ को गैरकानून घोषित किए जाने के बाद मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए इस विधेयक का संसद में पारित होना जरूरी है। एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने इस विधेयक की यह कहकर आलोचना की है कि यह संविधान की अवहेलना करता है और कानूनी रूपरेखा में फिट नहीं बैठता। मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय के मामलों से निपटने के लिए घरेलू हिंसा कानून और आईपीसी के तहत अन्य पर्याप्त प्रावधान हैं और इस तरह के नए कानून की जरूरत नहीं है। इस विधेयक के पारित होने और कानून बनने के बाद मुस्लिम महिलाओं को छोड़ने की घटनाएं और अधिक बढ़ जाएंगी।
 
 
सवाल यह है कि जब पहले से ही घरेलू हिंसा को रोकने के कानून हैं तो बार-बार तीन तलाक देने जैसे महापाप क्यों हो रहे हैं। उसे रोकने की दिशा में असदुद्दीन सरीखे मुस्लिम नेताओं ने आज तक क्या किया है। उन्हें लगता है कि यह कानून सख्त है। इसमें कानून का उल्लंघन करने वाले को तीन साल की जेल और जुर्माना की सजा हो सकती है। इसके बाद भी वे मुस्लिम महिलाओं को त्यागने की घटनाओं के बढ़ने जैसे तर्क दे रहे हैं। मतलब ऐसा इस कानून को धता बताने के लिए प्रतिक्रिया स्वरूप किया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद जो सौ से अधिक तीन तलाक के जो मामले सामने आए हैं क्या वे सब सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने के लिए दिए गए हैं। ओवैसी जैसे नेताओं को इस पर भी अपनी राय देनी चाहिए। 
राजद के जयप्रकाश नारायण यादव को लगता है कि विधेयक गैरजरूरी है। इसमें दोषी को तीन साल की सजा का प्रावधान सही नहीं है। बीजू जनता दल के सांसद भर्तृहरि महताब को विधेयक को पेश करने के तरीके पर ऐतराज है। उन्हें लगता है कि इसका मसौदा बनाने में ही खामियां हैं। विधेयक में तीन तलाक के संबंध में उच्चतम न्यायालय का फैसला नहीं झलकता और सरकार को इसे वापस लेकर पुनर्विचार करना चाहिए। आईयूएमएल के ईटी मोहम्मद बशीर और अन्नाद्रमुक के ए अनवर राजा ने भी विधेयक को गैरजरूरी बताया है और इसे विवाहित मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय को बढ़ाने वाला विधेयक करार दिया है। 
 
 
केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जब पहले ही यह बात स्पष्ट कर दी है कि यह विधेयक किसी पूजा, इबादत या मजहब से जुड़ा नहीं होगा बल्कि यह नारी सम्मान और गरिमा के लिए है तो पिफर इसके प्रतिवाद का आधार क्या है? उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद भी मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय की घटनाएं हो रही हैं। ऐसे में क्या संसद को खामोश रहना चाहिए। कुछ सदस्य बुनियादी अधिकारों और समानता की बात कर रहे हैं तो क्या इस सदन को तीन तलाक की पीड़िताओं के साथ हो रहे अन्याय को नहीं देखना चाहिए। 
 
 
मुस्लिम महिलाओं ने इस विधेयक को लोकसभा में रखने पर जिस तरह केंद्र सरकार की प्रशंसा की है, वह सब विपक्ष को कदाचित रास नहीं आया है। विपक्ष को धर्म से ज्यादा मुस्लिम मतों के विभाजन की चिंता सता रही है और मुस्लिम शायद इसलिए परेशान हैं कि देर सबेर अगर शरीयत के कानून को समाप्त करने की नौबत आ गई तो बहुविवाह की उनकी हसरत का क्या होगा? विवाह को अधिकार नहीं, दायित्व समझा जाना चाहिए। विवाह पारिवारिक जिम्मेदारी को वहन करने का सिद्धांत है, परंपरा है और अनुबंध है। यह समर्पण का श्रद्धा भाव है, उस भाव को महिलाओं की कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। महिलाओं के त्याग, उनकी ममता, स्नेह और अपनत्व भाव को मान दिया जाना चाहिए। 
 
 
मुस्लिम महिलाओं को उम्मीद है कि इस देश की संसद उनके हितों की रक्षा करेगी। उन्हें न्याय दिलाएगी। यह महिलाओं के अधिकार का मामला है, इसे मजहब की रोशनी में देखना स्नेह ममत्व और परिवार के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाली महिलाओं की कोमल भावनाओं को पददलित करने जैसा होगा। इस बिल को संसद के पटल पर रखने के तौर-तरीेके पर जिस किसी भी नेता को ऐतराज है, उसकी पहली जिम्मेदारी तो यह है कि वह इस देश की संसद को यह बताए कि इस देश में मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से निजात कैसे मिलेगी? वह कौनसा रास्ता है जिससे मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न रुक जाएगा और धार्मिक भावनाएं आहत नहीं होंगी। धार्मिक भावनाओं को आहत करना तो सरकार भी नहीं चाहेगी। अगर सीधी अंगुली से घी निकल जाए तो अंगुली टेढ़ी करने का श्रम शायद ही कोई करेगा। तीन तलाक का मामला अब पूरी तरह संसद में है। इस बिल का भविष्य संसद को तय करना है लेकिन मुस्लिम महिलाओं के हितों को लेकर इस देश के राजनीतिक दल कितने गंभीर हैं, इसका फैसला भी इसी सत्र में होना है। देखना यह है कि संसद का उच्च सदन दायित्वबोध की इस परीक्षा में पास होता है भी या नहीं और अगर होता है तो कितने अंक से।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं) 
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