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....न्यायमूर्तियों! राष्ट्र आपसे ये जानना चाहता है

By Dainik Bhaskar Up | Publish Date: 1/13/2018 7:04:53 PM
....न्यायमूर्तियों! राष्ट्र आपसे ये जानना चाहता है

  
लखनऊ| तो यह देश के इतिहास में पहली बार हुआ. ऐसा कि पहली बार न्याय व्यवस्था में बैठे लोग लाचार दिखे. लाचार के साथ सिस्टम की ओर उंगली उठाते हुए भी. एक-एक उंगली इन चार लोगों ने उठाई ज़रूर लेकिन इन चारों ने ध्यान न दिया कि इनकी चार-चार उंगलियां खुद इनकी ओर थीं. खैर, अब सब नंगई पर उतर ही गए हैं तो प्रारम्भिक बात उठती है कि अपने ही चीफ जस्टिस दीपक मिश्र से ये चार 'दुखी आत्माएं' मीडिया के पहले, व्यवस्था के मुताबिक़ राष्ट्रपति के पास क्यों नहीं गए?
 
यह बात तो सही ही है कि पूरा प्रकरण ऐतिहासिक है और देश के संविधानिक व्यवस्था में इस तरह से इन चार चतुर जस्टिसों के सार्वजनिक रोने का निहितार्थ कुछ और भी तो हो सकता है. क्योंकि जिस तरह से जस्टिस चेलमेश्वर के अड्डे पर बाकी तीन और जस्टिस पहुँच के सुप्रीम कोर्ट में 'इमर्जेन्सी' वाले हालात बयां कर पत्रकारों के सामने आर्तनाद किये, वो सब ऐतिहासिक रहा. इन चारों ने कहा कि मीडिया के समक्ष इसलिए कि अब राष्ट्र फैसला करे. लेकिन यह न बता पाए कि घर की कलह या मतभेद या मनभेद को राष्ट्र के सामने लाने से पहले राष्ट्रपति तक क्यों नहीं ले गए? अब जब राष्ट्र के सामने आ ही गए हैं तो राष्ट्र खुद इनसे पूछ रहा है. 
 
रही मीडिया की बात, तो पत्रकारों के एक कार्यक्रम में इलाहाबाद में न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय ने एक बार कहा था कि मीडिया को कोर्ट के क्रियान्वयन व आदेशों की समीक्षा का अधिकार है. इसलिए 'अनजाने या कृत्रिम अन्याय' के शिकार हुए इन चार न्यायमूर्तियों से जवाब अब मीडिया और राष्ट्र चाहेगा. हालाँकि यह कोई खुशी का मुद्दा नहीं है. फिर भी, इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह खुशी का मौक़ा है कि साहस के साथ इन लोगों ने अपनी बात देश के सामने रखी और अन्याय का खुलासा किया. 
 
वैसे तो इंदिरा जय सिंह की वकालत के इकदैशिक मार्ग को भी यह देश भलीभांति जानता है कि वह वामपंथी सोच की प्रश्रयकर्ता होते हुए आतंकियों और विघटनकारी तत्वों का मुकदमा मुफ्त में और आंदोलन चला कर लड़ती हैं. वैसे रिटायर्ड सोढ़ी ने इन चारों के इस 'परिश्रम' को धो दिया कि मतभेद को कभी सार्वजनिक नहीं करना चाहिए था. अब इन चारों की छुट्टी कर के महाभियोग लगा के सजा सुनाई जाए. मज़ेदार बात यह कि सोहराबुद्दीन मामले में जस्टिस बी एच लोया की मौत का मातम अब इन्हे साल रहा है तो यह बात भी इन चारों को कटघरे में खड़ा करती है. वैसे न्याय व्यवस्था की खामी गिनाने और जस्टिस लोगों की जवाबदेही और ज़िम्मेदारी सुनिश्चित की जाने लगती तो आज तक कई हज़ार जज साहब और जस्टिस लोग भी जेल की हवा खा आये होते. 
 
हाव भाव से उद्देश्य साफ़ झलक रहा था कि ये चारों दीपक मिश्रा के साथ-साथ केंद्र सरकार के रवैये से भी खुश नहीं. इसी साल दीपक मिश्रा रिटायर होंगे लेकिन उन पर यह हमला सुप्रीम कोर्ट से आने वाले बहुप्रतीक्षित फैसलों की दशा और दिशा को अब प्रभावित कर सकता है. शायद इन चारों के प्रलाप का एक छुपा उद्देश्य यह भी हो और इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी इस मुद्दे को लपक कर कहा कि लोकतंत्र खतरे में है. लोकतंत्र तो तब भी खतरे में था जब मायावती की यहाँ पिछली सरकार में उनके कार्यों पर यहाँ की हाई कोर्ट के रोक के फैसलों पर तब चीफ जस्टिस बालाकृष्णन वाली देश की सुप्रीम कोर्ट उल्टा फैसला दे रही थी लेकिन फिर भी कोई विद्रोह नहीं हुआ. 
 
दर्शन शास्त्र के मुताबिक़, न्याय व्यक्ति का सर्वोच्च सद्गुण है. तब भी धज्जियां खूब उड़ीं पर किसी ने चूं-चपड़ इसलिए नहीं की कि यह अपना न तो अधिकार है और न कर्तव्य, पर आज न्यायपालिका की व्यवस्था की धज्जिया खुद जस्टिस लोगों की अंतरकलह ने उड़ा दीं. खैर, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है और जो होगा, अच्छा होगा, मतलब यह कि चेलमेश्वर का साथ देने वाले रंजन गोगोई आसाम के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेसी नेता के सी गोगोई के सुपुत्र हैं. मदन भीमराव लोकुर और कुरियन जोसफ का इतिहास और सबंध भी अब राष्ट्र खोजेगा. फिलहाल, इन चार विद्रोहियों की वजह से न्यायपालिका की गरिमा बनी या गिरी, यह भी अब राष्ट्र तय करेगा. आपके सात पन्नों का खत पर आपसे जवाब भी यह राष्ट्र चाहेगा. बहरहाल आप चारों लोग,यह भी बताइये कि क्या आप 'अवार्ड वापसी महापुरुषों' के माफिक उनका कोई नया संस्करण हैं? राष्ट्र अब यह भी आपसे जानना चाहता है.
 
हेमेंद्र तोमर
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