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भ्रष्टाचार के खात्मे से पहले संस्कार बदलिए

By Dainik Bhaskar Up | Publish Date: 2/6/2018 12:14:57 AM
भ्रष्टाचार के खात्मे से पहले संस्कार बदलिए

 जिस जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘गुड और सिंपल टैक्स’ करार दिया है, क्या वह वास्तव में ऐसी है? कम से कम जो उत्तर प्रदेश के कानपुर में खुलासा हुआ है, उससे जीएसटी को लेकर एक बार फिर यह संशय उठ खड़ा हुआ है किे क्या इससे वाकई भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकेगा?

दरअसल, जीएसटी लागू करते वक्त यह कहा गया था कि इसका लाभ यह होगा कि समान दरों, सरल प्रक्रियाओं से भ्रष्टाचार और कर चोरी कम होगी। इसके विपरीत सरकार के मातहतों ने ही उसमें सेंधमारी कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा की हवा निकाल दी है। केंद्रीय जांच ब्यूरो की ओर से शनिवार को कानपुर में जीएसटी कमिश्नर की गिरफ्तारी ने एक बार फिर से जीएसटी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। कमिश्नर संसार सिंह पर रिश्वत लेने का आरोप है। कमिश्नर पर रिश्वतखोरी के लिए रैकेट चलाने का आरोप भी है। कमिश्नर के साथ ही आठ अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है। मामले में जांच अभी जारी है, लेकिन इस गिरफ्तारी के साथ इतना तो तय हो गया कि अगर सरकार डाल-डाल चल रही है, तो भ्रष्टाचारी भी पात-पात चलने के लिए जैसा पहले कमर कसकर तैयार थे, वैसे ही आज भी तैयार हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जीएसटी कमिश्नर संसार सिंह को रिश्वत लेने, रिश्वत की मांग करने और एक संगठित रैकेट चलाने के आरोप में सीबीआई ने गिरफ्तार किया है। सिंह पर व्यापारियों समते कई लोगों से रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया है। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) से जुड़ा अभी तक का यह अलग मामला है, जिसमें उच्च अधिकारी की गिरफ्तारी भी की गई है। सीबीआई के मुताबिक, इन जीएसटी अधिकारियों ने विभागीय कार्रवाई को रोकने के लिए कंपनियों से रिश्वत ली थी। रिश्वत का पैसा हवाला के जरिए व्यवस्थित रूप से मासिक या त्रैमासिक किश्त की तरह अधिकारियों को दिया गया था। दरअसल, जानकारों की मानें, तो लागू जीएसटी में अभी कई ऐसी खामियां थीं, जिन्हें दूर किए बगैर इसे लागू कर दिया गया। यही वजह रही कि जीएसटी ‘गुड एंड सिंपल टैक्स’ न बनकर एक बार फिर भ्रष्टाचार के रूप में सामने आया है। निर्धारित कई दरों, अधिभार, वस्तुओं के जटिल वर्गीकरण और दुरूह प्रक्रियाओं ने इससे चोरी-भ्रष्टाचार कम होने वाली बात की भी हवा पहले ही निकाल दी है। इन सबके बीच हकीकत यह भी है कि जब तक हम खुद ईमानदार नहीं बनेंगे, कोई भी सिस्टम या सरकार किसी भी भ्रष्टाचार तरह भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा सकती।

आज हमारे रग-रग में भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार दौड़ रहा है। बच्चे का जन्म हो, तो जच्चा के प्रसव के लिए भ्रष्टाचार, बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र चाहिए, तो भ्रष्टाचार, बच्चे के एडमिशन में भ्रष्टाचार समेत शायद ही जिंदगी का कोई ऐसा क्षेत्र हो, जहां भ्रष्टाचार न हो। आज भ्रष्टाचार हमारी संस्कृति में दूध और पानी की तरह घुल गया है। इसके लिए वैचारिक शुद्धता का होना आवश्यक है। जब तक हम अपने हृदय से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं छेड़ेंगे, भ्रष्टाचार का समूल नाश हो पाना नामुमकिन है।

नि:संदेह किसी भी योजना में कुछ अच्छाइयां होती हैं, तो कुछ बुराइयां भी होती हैं। केवल योजना बना देने भर से या उसे लागू कर देने से भ्रष्टाचार का सफाया नहीं हो सकता। जब हम सती प्रथा का उन्मूलन कर सकते हैं, जुआ खेलने वालों का सामाजिक बहिष्कार कर सकते हैं और यहां तक कि अछूत शब्द को भी काफी हद तक समाज से निकाल फेंक सकते हैं, तो ​​​भ्रष्टाचार का सफाया क्यों नहीं हो सकता। अधिकारी सिर्फ यह संकल्प लेकर अपने कर्तव्य की इतिश्री न करें कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं। उन्हें अपनी अंतरात्मा से कठोर इच्छाशक्ति के साथ यह भी संकल्प लेना होगा कि वे न तो खुद भ्रष्टाचार करेंगे, न अपनी संतति को इसके लिए प्रेरित होने देंगे। वे रूखा-सूखा खा लेंगे, सारी सुविधाओं का त्याग कर देंगे, लेकिन भ्रष्टाचार को ​​रहने नहीं देंगे, तो भला भ्रष्टाचार कितने दिनों तक टिक पाएगा। अगर ऐसा नहीं हो सकता, तो यह तय है कि सरकार चाहें, जितनी मगजमारी कर ले, भ्रष्टाचार का विनाश नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार जब भी खत्म होगा, वह सर्वप्रथम हमारी अंतरात्मा से ही मिटेगा। हमारी सोच से ​मिटेगा। हमारे संकल्प से मिटेगा। हमारे अपने विचार से मिटेगा; इसके अलावा भ्रष्टाचार को मिटाने का न तो कोई विकल्प है और न ही कोई अन्य रास्ता।

जीएसटी कानून बनाने में एक राय से सहमति जताने वाले कुछ विपक्षी भी सिर्फ इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि इसे बगैर पूरी तैयारी के लागू किया जा रहा है। ऐसे में क्या माना जाए कि पूरी तैयारी से लागू होने पर यह जनता के हित में होता? इस किस्म की आलोचना एकसमान हितों वाले वर्गरहित समाज में ही की जा सकती है। हमारा समाज ऐसा समानता पर आधारित समाज नहीं है। इसमें जहां एक ओर 81 प्रतिशत संपत्ति के स्वामी 10 प्रतिशत कॉरपोरेट लोग हैं, वहीं गरीबी में जीते बहुसंख्यक मजदूर-किसान और बहुत से छोटे काम-धंधे करने वाले लोग भी हैं। इस समाज में कोई भी नीति ऐसी नहीं हो सकती, जो सब वर्गों के लिए समान हितकारी हो।

हर नीति का विश्लेषण इस आधार पर होना चाहिए कि इसका फायदा किस तबके को होगा और नुकसान किस तबके को। ऐसे वर्ग विभाजित, गैर-बराबरी और शोषण पर आधारित समाज में प्रत्येक नीति का विभिन्न वर्गों की जिंदगी पर असर समझे बगैर की गई कोई भी चर्चा निरर्थक या गुमराह करने वाली है।


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