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Friday,19 January 2018
    नए साल का पहला चंद्रग्रहण 31 जनवरी को

    नए साल का पहला चंद्रग्रहण 31 जनवरी को

    यह पूर्ण चंद्रग्रहण मध्यप्रदेश समेत पूरे देश में लोग खुली आंखों से देख सकेंगे। इसके अलावा एक चंद्र और तीन सूर्यग्रहण भी नए साल में पड़ेंगे, लेकिन वे भारत में नहीं दिखाई देंगे।

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    आधुनिक जीवनशैली की देन है पीठ का दर्द

    आधुनिक जीवनशैली की देन है पीठ का दर्द

    अनियमित खानपान और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच तेजी से उभर रही समस्या पीठ दर्द को आमतौर पर लोगबाग अधिक गंभीरता से नहीं लेते, जबकि शुरुआती दौर में दर्द को नजरअंदाज करना उम्र बढ़ने के साथ बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 30 साल की उम्र से ऊपर का हर पांचवा व्यक्ति किसी-न-किसी वजह से पीठ दर्द की समस्या से पीड़ित है। चिकित्सक इसके लिए सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति के अलावा लॉन्ग ड्राइविंग और कंप्यूटर पर एक अवस्था में घंटों बैठकर काम करने की प्रवृत्ति समेत अन्य कारकों को जिम्मेदार मानते हैं।

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    स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण की आवश्यकता

    स्वास्थ्य सेवाओं के आधुनिकीकरण की आवश्यकता

    भारत उन देशों में अग्रणी है, जिन्होंने अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य का तेजी से निजीकरण किया है और सेहत पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों की सूची में बहुत ऊपर है। दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन भारत इस अनुपात को हासिल करने में बहुत पीछे है। देश भर में चौदह लाख लाख डॉक्टरों की कमी है और प्रतिवर्ष लगभग 5500 डॉक्टर ही तैयार हो पाते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के मामले में तो स्थिति और भी बदतर है।

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    अनेक समस्याओं का हल है परमाणु ऊर्जा

    अनेक समस्याओं का हल है परमाणु ऊर्जा

    आज संपूर्ण विश्व में लगभग 450 परमाणु बिजलीघर कार्यरत हैं, जिनसे 24 घंटे, 365 दिन, बिजली का निर्माण किया जा रहा है। एक तरफ जहां भारत में विभिन्न ऊर्जा के स्रोतों से बिजली का उत्पादन किया जाता है, जिसमें लगभग 80 प्रतिशत बिजली थर्मल से, 10.5 प्रतिशत हाइड्रो से और 6.5 प्रतिशत अन्य स्रोतों से हैं, वहीं परमाणु ऊर्जा से महज 3 प्रतिशत ही बिजली का उत्पादन होता है।

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    भारत का व्यक्तित्व है भगवा : हृदय नारायण दीक्षित

    भारत का व्यक्तित्व है भगवा : हृदय नारायण दीक्षित

    हरेक रंग के अपने प्रभाव हैं। हम सब देर तक लाल रंग नहीं देख सकते, लेकिन नीला रंग सुख देता है और हरा भी। हरा रंग के शोभन होने के कारण ही हम ‘हरा-भरा’ देखने के भूखे हैं। प्रकाश के अंत:करण में उपस्थित सातों रंग अस्तित्व के उपहार है। संसार बोध में सात का महत्व है। सात रंग हैं, तो सात सुर भी। सा रे ग म प ध और नि हम सबने सुना ही है। यहां स षड़ज है, रे ऋषभ है, ग गांधार है, म मध्यम है, प और ध धैवत है। राग और सुर सुने जाते हैं, देखे नहीं जा सकते। अभिनय देखा जाता है, इसीलिए रंगकर्म कहलाता है और अभिनय के स्थान को रंगशाला कहते हैं। रंग मुक्त नहीं करते, बांधते हैं। रंग हमारी आसक्ति हैं।

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    ग्लोबल वार्मिंग : तेज़ी से बदलता मौसम

    ग्लोबल वार्मिंग : तेज़ी से बदलता मौसम

    मौसम के बदलाव ने बहुत कुछ बदल दिया है। यह मौसम का बदलाव ही है कि नवंबर और दिसंबर में चेन्नई में भीषण बाढ़ के कारण तबाही मच जाती है और यह बारिश पिछले सौ सालों का रिकॉर्ड तोड़ देती है। एक और जहां लातूर, विदर्भ और बुंदेलखंड में लोग पानी के लिए तरसते और सूखे की मार झेलते किसान हैं, तो उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मई माह में पहाड़ खिसकने से भारी हिमपात और तबाही का मंजर पैदा हो जाता है।

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    नौकरियों का अकाल-सा पड़ गया था उन दिनों : सुरेश उनियाल

    नौकरियों का अकाल-सा पड़ गया था उन दिनों : सुरेश उनियाल

    उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 4 फरवरी,1947 को जन्मे सुरेश उनियाल की कहानियों में अनुभव और पर्यवेक्षण की रचनात्मक समृद्धि के साथ मानवीय संबंधों की गरिमा अपनी उपस्थिति दर्ज कराती चलती है। यांत्रिकता के चंगुल में फंसे लोगों के बीच मानवीय संबंधों की मंद पड़ती आग को उष्मा देने का काम भी करती हैं इनकी कहानियां। फंतासी रचने में इनका कोई जवाब नहीं। नेशनल बुक ट्रस्ट के ‘यूनेस्को कूरियर’ जैसे अंतर्राष्ट्रीय पत्र से शुरू होकर ‘सारिका’, ‘दिनमान’ और ‘सांध्य टाइम्स’ तक विविध विषयक पत्रकारिता करने वाले सुरेश उनियाल ने कई दर्जन किताबों के अनुवाद तो किए ही, सत्तर से अधिक यादगार कहानियां भी हिंदी को दी हैं। पांच कहानी संग्रहों में से ‘यह कल्पना लोक नही’ के लिए इन्हें हिंदी अकादमी, दिल्ली ने सम्मानित किया है। पेश है उनसे हुई वार्ता।

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    स्व-उपचार नहीं एसीडिटी का हल

    स्व-उपचार नहीं एसीडिटी का हल

    एसीडिटी से पीड़ित होना सामान्य बात है और उससे भी सामान्य बात है इस रोग का स्व-उपचार। जबकि, चिकित्सकों का कहना है कि जीवनशैली और सोने की आदत को प्रभावित करने वाली एसीडिटी को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए, वर्ना लेने के देने पड़ सकते हैं।

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    गांधीजी की हत्या में चौथी गोली का तिलिस्म

    गांधीजी की हत्या में चौथी गोली का तिलिस्म

    क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को तीन के बजाय चार गोलियां मारी गई थीं? क्या नाथूराम गोडसे के अलावा किसी और ने भी उन पर गोली चलाई थी? क्या तत्कालीन सरकार ने गांधीजी की हत्या की जांच सही तरीके से नहीं कराई? क्या राष्ट्रपिता की सुरक्षा को लेकर जान-बूझकर लापरवाही बरती गई? ये कुछ सवाल भले फिलहाल मुंबई और महाराष्ट्र में सक्रिय अभिनव भारत संगठन ने एक याचिका के रूप में सुप्रीम कोर्ट के सामने रखे हों, लेकिन इतिहास गवाह है कि यह सवाल पहली बार नहीं उठा है। भाजपा सालों से अलग-अलग तरीके से यह सवाल उठाती रही है।

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